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एक को जानो, एक को मानो, एक हो जाओ : सदगुरु सुदीक्षा जी महाराज

वूमेन स्पेशल संपादकीय ब्लॉग

एक को जानो, एक को मानो, एक हो जाओ : सदगुरु सुदीक्षा जी महाराज

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–संत निरंकारी मिशन की प्रमुख सद्गुरू सुदीक्षा जी महाराज ने भक्तों को किया संबोधित
—परमात्मा के निराकार रूप की पहचान कर लेना पहली सीढ़ी मात्र ही है

(खुशबू पाण्डेय)
नई दिल्ली/ टीम डिजिटल : संत निरंकारी मिशन की प्रमुख सदगुरु माता सुदीक्षा जी महाराज ने कहा कि परमात्मा को भिन्न-भिन्न नामों से पुकारे जाने के बावजूद परमात्मा एक ही है, एक ही परम् आस्तित्व के भिन्न-भिन्न नाम है। ईश्वर निराकार है, सभी जगह समान रूप से विद्यमान है, स्थिर है, एक रस है। उन्होंने कहा कि जब व्यक्ति ईश्वर के निराकार रूप को जान लेता है तभी वह ईश्वर को एक मान पाता है और जब एक मान लेते हैं तो स्वत: ही एक हो जाने वाला भाव जीवन में घटित हो जाता है। सद्गुरू सुदीक्षा एक डाक्युमेंट्री कार्यक्रम के द्वारा रविवार को श्रद्धालु भक्तों को सम्बोधित कर रही थीं।
सदगुरु माता सुदीक्षा जी महाराज ने कहा कि परमात्मा के निराकार रूप की पहचान कर लेना पहली सीढ़ी मात्र ही है। यहां से भक्ति की यात्रा का आरम्भ होता है। ईश्वर सम्पूर्ण प्रकृति में इस प्रकार समाया हुआ है जैसे कि पत्थर में अग्नि। परन्तु यह दिखाई नही देती है। लेकिन, सदगुरू द्वारा जब व्यक्ति को ईश्वर की अनुभूति हो जाती है तो वह हर इंसान में परमात्मा के दर्शन करने लगता है और सभी के प्रति हृदय में प्रेम जागृत हो जाता है और जीवन में समभाव का समावेश आ जाता है। तदोपरान्त द्वितीय चरण एक को मानना है। उन्होंने कहा कि जब कोई किसी मित्र का परिचय करा रहा होता है,परन्तु उसे कभी देखा नहीं होता तो उसके बारे में कल्पना ही कर पाते हैं लेकिन जब हम उससे मिल लेते हंै, उसे देख लेते हैं तो उसका स्वभाव भी जान लेते है। इसी प्रकार परमात्मा को तत्व रूप से जानने के पश्चात ही विश्वास आता है कि परमात्मा ही सब कुछ करने वाला है। यही मात्र एक ऐसी शक्ति है जिसकी मर्जी से ही सब घटित हो रहा है। भक्त प्रत्येक परिस्थिति को फिर इसकी रजा ही मान लेता है और कह उठता है।
सदगुरु माता सुदीक्षा जी महाराज ने कहा कि जब मनुष्य का ईश्वर से एकाकार हो जाता है तो प्रत्येक में ईश तत्व के दर्शन करने लगता है, अपना ही स्वरूप हर एक में दिखने लगता है फिर कोई भी किसी भी धर्म जाति स्थान से सम्बन्ध रखता हो उसमें परमात्मा ही दिखाई देता है। दूसरे का दुख दर्द भी अपना लगने लगता है। जैसे कि कहा भी गया है…संत हृदय नवनीत समाना।
इस प्रकार एक को जानकर एक को मानकर एक हो जाने वाली अवस्था को प्राप्त कर लेता है। खंजर चले किसी पर तड़पते हैं हम, सारे जहां का दर्द हमारे जिगर में हैं।

निरंकारी राजमाता कुलवन्त कौर को श्रद्धांजलि अर्पित की

निरंकारी समाज ने निरंकारी राजमाता कुलवन्त कौर को स्मरण करते हुये भावभीनीं श्रद्धांजलि अर्पित की। इस अवसर पर उनके जीवन पर प्रकाश डालते हुए संत निरंकारी चेरीटेबल फाउण्डेशन की मेंम्बर इंचार्ज बिन्दिया छाबड़ा ने कहा कि राजमाता गुरू भक्ति और गुरू मर्यादा एक अनूठीं मिसाल रहीं। उन्होंने अपने सामाजिक रिश्तों से उपर उठकर सदैव एक गुरसिख के रूप में ही जीवन जिया और अपने बच्चों को हमेशा प्रेरित करती रहीं कि एक गुरसिख के लिये सदगुरू ही सबसे पावन रिश्ता होता है। निरंकारी राजमाता ने मानव समाज को आध्यात्मिक रूप से जागृत करने के लिये अपना सम्पूर्ण जीवन समर्पित कर दिया। अपने प्रवचनों में अक्सर कहा करती थीं कि मानव जीवन अत्यन्त दुर्लभ है और अनेक योनियों के उपरान्त ईश्वर की असीम कृपा से यह जीवन प्राप्त होता है एवं इसका परम लक्ष्य ईश्वर को जानना ही है। जिस प्रकार एक बार फल के वृक्ष से गिर जाने पर दोबारा नहीं लगता ठीक उसी प्रकार मानव जीवन रहते हुये ईश्वर की प्राप्ति नहीं की तो यह जीवन व्यर्थ हो जाता है।

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