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कुंवारी लड़कियों के लिए आरक्षित है एक नृत्य… आप भी जाने

वूमेन स्पेशल संपादकीय ब्लॉग

कुंवारी लड़कियों के लिए आरक्षित है एक नृत्य… आप भी जाने

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(स्मृति शर्मा) 
नवरात्रि भारत भर में मनाये जाने वाले पर्वों में से मुख्य पर्व है, तथा शुक्लपक्ष के प्रारम्भ का भी प्रतीक है। यह एक विशेष पर्व है, जिसमें पारम्परिक पूजन, नृत्य व संगीत सब सम्मिलित रहते हैं। शास्त्रीय नृत्य व गायन होता है और विभिन्न वाद्य यंत्र बजाये जाते हैं। देवी पुराण के अनुसार देवी की आराधना एवं साधनाओं में संगीत के साथ नृत्य का भोग भी अभिन्न अंग है।सामवेद के अनुसार नृत्य के माध्यम से देवी शीघ्र प्रसन्न होती है। नवरात्रो में नृत्य की बात करे तो गुजरात के गरबे की रंग बिरंगी पोशाके आँखों के सामने आ जाती है, परन्तु भारत भर में अनेक नृत्य है जो इस उत्सव के साथ जुड़े हुए हैं।

नवरात्रि : नवदुर्ग नौ दिनों का उत्सव

नवरात्रि, नवदुर्ग नौ दिनों का उत्सव है, नवरात्री दो शब्दों के मेल से बना है। नव तथा रात्रि – नव का अर्थ है नौ-रात्रि का अर्थ है रात -अर्थात नौ रातो तक मनाया जाने वाला उत्सव। साल में दो बार चैत्र नवरात्रि और शारदीय नवरात्रि के रूप में मां दुर्गा के नौ रूपों की अराधना की जाती है। सभी नौ दिन माँ आदि शक्ति के विभिन्न रूपों को समर्पित किए गये हैं। नौ रातों में तीन देवियों-महालक्ष्मी, महासरस्वती और महाकाली के नौ स्वरुपों की पूजा होती है। पहले तीन दिन दुर्गा, अगले तीन दिन लक्ष्मी और आखिरी तीन दिन सरस्वती को समर्पित हैं। भक्त क्रमशः माता के नौ रूपों की पूजा करते हैं। माता शैलपुत्री माता, माता ब्रह्मचारिणी माता, माता चंद्रघंटा, माता कूष्माण्डा -माँ अष्टभुजा देवी, माता स्कन्दमाता, माता कात्यायनी माँ, माता कालरात्रि- देवी शुभंकरी, माता महागौरी, माता सिद्धिदात्री।
शाकत समुदाय के तंत्र शास्त्र अनुसार देवी के दो रूप बताये गए हैं। करुणा रुपी माँ के रूप में पार्वती, उमा,गौरी, तथा प्रचंड रूप में दुर्गा,चामुंडा, महिषासुर मर्दिनी की पूजा होती थी। भारत में देवी पूजा का सम्बन्ध शाक्त परम्परा से है।

भारत में 5 तरह के संप्रदाय

भारत में 5 तरह के संप्रदायों माने जा सकते हैं:- वैष्णव, शैव,शाक्त,स्मार्त और वैदिक संप्रदाय। परन्तु वैष्णव ,शैव ,शाकत सम्प्रदाय सर्वमान्य रहे है। वैष्णव विष्णु की पूजा करते हैं, शैव शिव की, शाक्त जो देवी को ही परमशक्ति मानते हैं । शैव समुदाय मैं शक्ति को शिव की पत्नी माना जाता है। माता शक्ति के वर भगवान शिव के नटराज सवरूप को नृत्य का देवता माना जाता है।
वाजस्नेयी सहिंता में दुर्गा,अम्बा,काली नाम का उल्लेख मिलता है। छतीसगढ राज्य में पाए गए शिलालेख में दूसरे श्लोक से छतीसवे श्लोक तक माता के विभिन्न रूपों, उसके वाहनों एवं पूजा के बारे विस्तृत जानकारी मिलती है। पुराणों में देवी देवताओ की शक्तियों का वर्णन भी मिलता है।मार्कण्डेय पुराण में शक्ति द्वारा महिसासुर, रक्तबीज, चण्ड मुंड राक्षसों के संहार का वर्णन एवं पार्वती के नौ रूपों (नवदुर्गा) पूजा का उल्लेख पाया जाता है। उनकी आराधना आश्विन शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से महानवमी तक की जाती है।

नृत्‍य को माना गया है साधना का एक मार्ग

प्राचीन समय ही से देवी देवताओ की पूजा में नृत्य अभिन्न किर्या माना जाता रहा है। भारत के धार्मिक उत्सव लोक नृत्यों के बिना अधूरे है नवरात्रो में भी नृत्य का अभूतपूर्व महत्व है। भारत के हर राज्य में नवरात्रो पर विशेष पूजा तथा नृत्यों का आयोजन किया जाता है।
हिमाचल के चामुंडा देवी के मंदिर में अष्टमी के दिन,रात्रि बारह बजे के भोग से पहले शास्त्रीय संगीत की धुन बजायी जाती है फिर माँ को भोग लगाया जाता है, जिसमे भोग के पदार्थो के संख्या तीन सौ पैसंठ तक भी हो सकती है। दुर्गा सप्तशती ग्रन्थ के अंतर्गत महिषासुर मर्दिनी को समर्पित देवी कवच स्तोत्र- आई गिरी नंदिनी कलाकारों में अत्यंत लोकप्रिय है। जिसे एक बंगाली कवि तेनाली रमन–(कवि रामकृष्ण की रचना माना जाता है, लेकिन तमिल ब्राह्मणों द्वारा आदि शंकराचार्य को इसका रचना कार माना जाता है।

धुनुची नाच- बंगाल – परम्परा की झलक

यह नवरात्रों में दुर्गा पूजा के दौरान किए जाने वाला नाच है। बंगाल परम्परा का हिस्सा यह नृत्य मां भवानी को समर्पित है। धुनुची नाच सप्तमी से शुरू होता है और नवमी तक चलता है। इस समूह नृत्य मैं किसी भी उम्र के आदमी,औरते भाग ले सकते हैं। हाथ में हवन समाग्री का धुनो ले कर लोग नृत्य करते हैं धूनी को जलते हुए कोयले के तल पर रखकर जलाया जाता है, जो धीमी गति से जलने वाले नारियल की भूसी की एक परत को प्रज्वलित करता है, जिस पर कपूर छिड़का जाता है। बंगाली देसी ढोल ढाक की धमाकेदार धुन में मदमस्त हो कर नर्तक दोनों हाथो से दो धुनो का संतुलन बना कर नाच दिखाता है।कुछ नर्तक तो अपने दांतो से भी धुनो पकड़ कर करतब दिखाते हैं।

गरबा लोकनृत्य- गुजरात- सौभाग्य का नृत्य

‘गरबा’ का अर्थ है मटके के अंदर रखा हुआ दीपक। गरबा सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है। गरबो एक धार्मिक मिट्टी के मटके को कहते हैं। महिलाएं मिट्टी के एक छिद्रो वाले कलश को सजाती हैं। मटके को पानी से भर कर एक सुपारी और चाँदी का सिक्‍का रखा जाता है, ,जिसमें दिया रखा जाता है। इसके ऊपर एक नारियल रखा जाता है। नवरात्रि के नौ दिन महिलाओं के समूह द्वारा देवी अंबा के सम्मान में एक गोलाकार गति में गरबा नृत्य किया जाता है। हाथो से ताली बजा कर ताल दी जाती है गरबा नृत्य में ताली, चुटकी, खंजरी, डंडा, मंजीरा आदि वाद्य यंत्रो प्रयोग होता है। यह नृत्‍य नवरात्रि, शरद पूर्णिमा, बसंत पंचमी, होली और अन्‍य उत्‍सवों में किया जाता है। महिलाएँ गोल चक्कर में घूमते हुए झुकती, मुड़ती, हाथों से तालियाँ और कभी-कभी अंगुलियों से चुटकी बजाती हैं। इस नृत्य के साथ देवी की स्तुति में गीत भी गाए जाते हैं। कुआर सुदी पड़वा से लेकर नवमी तक चलने वाला नवरात्रि उत्सव का यह नृत्य प्रमुख अंग बन गया है। गुजरात के इस नृत्य ने पुरे विश्व में अपनी पहचान बना ली है।

झिझिया नृत्य : बिहार-तंत्र मंत्र पर आधारित नृत्य

यह नृत्य मिथिलांचल क्षेत्र का पारंपरिक लोक नृत्य है। बिहार के इलावा नेपाल,उत्तर प्रदेश में भी यह नृत्य किया जाता है। यह नृत्य शारदीय नवरात्रे के प्रथम दिन से आरम्भ हो जाता है तथा अंतिम दिन तक चलता है इस नृत्य का नाम जलते दिए से लिया गया है, -जिसे स्थानीय भाषा में झिझिया कहते हैं यह तंत्र मंत्र पर आधारित नृत्य है। इस नृत्य में केवल कुंवारी लड़कियां ही भाग लेती है। इस नृत्य में भी गुजरात के प्रसीद गरबा नृत्य की तरह एक छिद्रो वाली मटकी को सिर के ऊपर रखा जाता है मटकी के अन्दर एक दीपक (झिझिया) जला कर रखा जाता है। सभी दीपो को आटे के साथ घड़े से चिपका दिया जाता है, ताकि वो गिरे नहीं । दीपक का बुझना अमंगल का सूचक माना जाता है। मटकी के मुख के ऊपर ढक्कन पर भी एक दीपक जलाया जाता है। मां दुर्गा की आराधना को समर्पित नृत्य घूम घूम कर किया जाता है। यह भी मान्यता है यदि डायन इस मटकी की छिद्र गिन ले तो नर्तकी की मृत्यु हो जाती है। इसलिए इस तीव्र गति से किया जाता है,जो बहुत ही मुश्किल है इसके गीतों मै गालियों का भी इस्तेमाल होता है जो बुरी आत्माओ को भगाने के लिए दी जाती है लोग अपने घर के बाहर निम्बू तथा मिर्ची भी टांगते हैं। इस नृत्य को झिरिया, झांझरी, झिहरी भी कहा जाता है यह नृत्य आज मृत्यु शैया पर है और लुप्त होने की कगार पर है।

जवारा नृत्य : छत्तीसगढ़- किन्नर नृत्य करके देते है आशीर्वाद

नवरात्री के पहले दिन जौ यानी जवारे, पूजा के साथ माता की मूर्ति के सामने एक मिट्टी के बर्तन मैं बोए जाते हैं। विजयादशमी के दिन ही छत्तीसगढ़ में खेल जवारा निकाला जाता है तथा परंपारिक तरीके से जवारे का विसर्जन संगीत एवं नृत्य के साथ किया जाता है। इसमें किन्नर जवारा और खप्पर धारण करके नृत्य करते हुए विसर्जन की शोभायात्रा मैं भाग लेते हैे। जवारे विसर्जन के पूर्व दुर्गा माता तथा जवारों की विधि-विधान से पूजा की जाती है, उसके बाद जवारे का विसर्जन किया जाता है। रास्ते में लोग उन बच्चो को इन नृतकों से आर्शीवाद दिलवाते हैं जो बीमार रहते हैं। आशीर्वाद के लिए छोटे बच्चों को गोद में लेकर किन्नर नृत्य करती हैं। धार्मिक मान्यता अनुसार जिन औरतो के संतान नहीं होती वो सड़क पर लेट जाती हैं किन्नर नर्तक उन्हें आशीर्वाद देती है। काली माता का रूप धारण कर भी नृत्य किया जाता है इसलिए काली नृत्य भी कहा जाता है।

नौरता नृत्य : कुंवारी लड़कियों का खेल नृत्य बुंदेलखंड

नौरता अर्थात नवरात्री बुंदेलखंड के अंचल में यह नृत्य कुंवारी लड़कियों द्वारा नवरात्री के नौ दिनों में किया जाता है। नवरात्र शुरू होने से पहले ही इसकी तैयारी शुरू कर दी जाती है। इस नृत्य में शादी के बाद भाग लेना वर्जित है। अश्वनि शुक्ल प्रतिपदा से पूरे नौ दिन तक ब्रह्ममुहूर्त में गांव की चौपालों या नगरों के बड़े चबूतरों पर अविवाहित बड़ी बेटियों द्वारा सरजित एक रंग बिरंगा ऐसा संसार दिखता है जिसमें एक व्यवस्था होती है, संस्कार होते हैं। रागरंग और लोकचित्रों में बुन्देली गरिमा होती है। हमारी बेटियां एक साथ गीत संगीत, नृत्य चित्रकला और मूर्ति कला, साफ-सफाई संस्कारों से मिश्रित लोकोत्सव नौरता मनाती है।शादी के बाद इस नृत्य नौरता उजाना की रस्म भी की जाती है, जैसे उत्तरी भारत में व्रत का मोख किया जाता है। प्राचीन लोक कथा अनुसार एक दैत्य ने कुछ कन्याओं का उपहरण कर लिया उन्होंने माँ दुर्गा की आराधना की। माँ दुर्गा ने उस राक्षस का वध कर दिया। यह नृत्य एक खेल के रूप में बुंदेलखंड में प्रथा के रूप में स्थापित है। बुन्देली में सुअटा का अर्थ बेएंगा है। शिवजी का स्वरुप बेढव है। यह लोकोत्सव बुन्देलखण्ड की मात्र कुआँरी कन्याओं के लिए आरक्षित है। इसमें देवी पार्वती की आराधना का स्वरुप कुंआरी अवस्था का ही है। नौरता का अर्थ एक दैत्य था (सुअटा का भूत) जो कुंआरी कन्याओं को खा जाता था। लड़कियों ने उससे प्राण बचाने के लिए माता पार्वती की आराधना नवरात्रि में की और वे सुरक्षित हो गयीं। यह कुंवारी कन्याओं का ही पर्व है। गौर का ही कुंवारा स्वरुप इसमें आया है। सामान्य गीतों में “नारे सुअटा” में वही भूतनाथ का विचित्र स्वरुप है जो गोस्वामी तुलसीदास जी ने श्री रामचरित मानस में शिव विवाह के वर्णन में दूल्हारुपी शिव का लिखा है।

ढिमरयाई नृत्य बुंदेलखंड –

यह नृत्य ढीमर जा​ति के लोग करते हैं, जिनका काम लोगो के घरो में पानी भरने का होता था। इनकी जाति के नाम पर इनके नृत्य का नाम ढिमरयाई नृत्य पड़ा। यह एकल नृत्य है। इस नृत्य का सीधे तोर पर नवरात्रो से कोई सम्बन्ध नहीं है। क्योकि यह नृत्य तीज त्यौहार पर किये जाते हैं। इनके गीतों मै माँ दुर्गा को समर्पित गीत भी होते हैं। इसलिए इसे नवरात्र पर दुर्गा के गीतों पर प्रस्तुत किया जाता है। यह एक तीव्र गति का नृत्य है।

हुलिवेशा : कर्नाटक का टाइगर डांस

हुलिवेशा “टाइगर मस्के” कर्नाटक के तुलु नाडु क्षेत्र में एक लोक नृत्य है। हुली का अर्थ है “बाघ”, ‘वेशा’ का अर्थ पोशाक है। देवी नवरात्रि के दौरान हुलीवा का प्रदर्शन किया जाता है। इस नृत्य को पिल्ली (टाइगर) वेश नृत्य भी कहा जाता है। यह नृत्य केवल पुरष ही करते हैं, जिसमे पुरुष बाघ की वेशवूषा मैं तैयार होते हैं। मुख पर नकली फर से बना मुखौटा, नकली पूंछ लगाया जाता है, बाकी नंगे बदन पर पीले तथा काले रंग से धारिया से विभिन्न डिजाइनों को चित्रित किया जाता है। जो बाघों, चीता और तेंदुओं को दर्शाता है। कुछ साल पहले मैंगलोर की एक महिला सुषमा ने इस नृत्य में भाग लिया एवं उसको प्रथम महिला नृतक बनने का गौरव प्राप्त हुआ।

पुल्लिकली : ‘टाइगर डांस’- केरल

दो सौ साल पुराने इस नृत्य को केरल में पुल्लिकली या कडुवाकली के नाम से भी जाना जाता है। पुलिक्कली का शाब्दिक अर्थ ‘बाघों का खेल’ है। इसमें नर्तक की वेशभूषा कर्नाटक के टाइगर नृत्य की तरह ही रहती है। केरल में लोग नवरात्र को ‘टाइगर डांस’ का आयोजन करके मनाते हैं। ये दक्षिण भारत का एक पारंपरिक नृत्य है और इस नृत्य के माध्यम से देवी दुर्गा के प्रति सम्मान और आभार जताया जाता है। इस नृत्य को शुरू करने से पहले पूजा की जाती है और उसके बाद ही ये नृत्य किया जाता है। उडुक्कू और थकिल जैसे वाद्ययंत्रों के बीट्स पर नृत्य की प्रस्तुति दी जाती है। देवी के विसर्जन के दौरान भीइस नृत्य का आयोजन किया जाता है।

नवदुर्गा नाच– नेपाल

भारत के अलावा पडोसी देश नेपाल भी एक हिन्दू राज्य है। यहाँ की सभ्यता ,रीति रिवाज़ आपस में बहुत मिलते हैं। यहां भी नवरात्र के दौरान एक नृत्य का आयोजन किया जाता है, जो देवी शक्ति के सन्मान में किया जाता है। इसे नवदुर्गा नाच के नाम से जाना जाता है। इसमें पुरुष ही भाग लेते हैं। दशयन यानि दशहरा के बाद यह नृत्य मुखौटा लगा कर किया जाता है।

कांठी नाच: झारखंड- दुःख का नृत्य

भारत में विभिन्न रीति रिवाज एवं मान्यताएं हैं। आपको यह जानकार हैरानी होगी की भारत में कई आदिवासी प्रजातियां अपने आप को महिषासुर का वंशज मानती हैं। झारखंड के सिंहभूम इलाके में पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश के कई आदिवासी इलाकों मैं महिषासुर की पूजा की जाती है तथा महिषासुर की याद में नवरात्र की शुरुआत के साथ दशहरा यानि दस दिनों तक वे लोग शोक मनाते हैं। इन आदिवासी समूह पर शोध करने वालों के अनुसार इन लोगों की मान्यता है, महिषासुर का असली नाम हुडुर दुर्गा था। वो एक राजा थे और वह महिलाओं पर हथियार नहीं उठाते थे। इसलिए दुर्गा ने उनकी छल से हत्या कर दी। संथाल समाज के लोग दशकों से नृत्य-गीत के माध्यम से महिषासुर के मारे जाने पर दुख जताते हैं। महिषासुर की मृत्यु के शोक में दसाई और कांठी नाच प्रस्तुत किया जाता है। झारखंड मैं इस विषय पर राजनीतिक विवाद भी हुआ है।

Written by smriti sharma

Phd dance and classical performer of Bharatnatyam and kathak

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