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ताईवान के IT प्रोफेशनल व फैशन डिजाइनर बुंदेलखंड में सीख रहे खेती के गुर

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ताईवान के IT प्रोफेशनल व फैशन डिजाइनर बुंदेलखंड में सीख रहे खेती के गुर

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—कोरोना संकट ने प्रकृति के प्रति संजीदा सोच रखने वालों को जीवन शैली में बदलाव लाने के लिये प्रेरित किया

(निर्मल यादव )
बांदा (उत्तर प्रदेश) : कोरोना संकट ने प्रकृति और पर्यावरण के प्रति संजीदा सोच रखने वालों को अपनी जीवन शैली में बदलाव लाने के लिये प्रेरित किया है। इसी का नतीजा है कि फैशन डिजाइनिंग और सूचना प्रोद्योगिकी क्षेत्र से लेकर पत्रकारिता और कला जगत तक, विभिन्न क्षेत्रों के लोग अब अपना कार्य क्षेत्र बदलकर प्रकृति के नजदीक रहने के लिये गांव और खेती किसानी का रुख कर रहे हैं।
खेती किसानी के जरिये प्रकृति के करीब रहकर काम करने के लिये उत्तर प्रदेश के बुदेलखंड में एकजुट हुये विभिन्न क्षेत्रों के कार्य कुशल लोग (प्रोफेशनल) खेती के गुर सीख रहे हैं। बुंदेलखंड के प्रगतिशील किसान प्रेम सिंह के बांदा स्थित फार्म हाऊस में उन लोगों का प्रशिक्षण पाठ्यक्रम शुरु किया गया है जिन्होंने अपने मौजूदा प्रोफेशन को छोड़ कर संतोषप्रद जीवनशैली अपनाने के लिये अब खेत खलिहान में अपना हुनर दिखाने का फैसला किया है।


ताईवान में कार्यरत आईटी प्रोफेशनल राजीव सिंह और उनकी पत्नी साक्षी हों या गांधीनगर के फैशन डिजाइनर रोहित दुबे और लोकगायिका बेबी रानी प्रजापति हों, तमाम अन्य क्षेत्रों के प्रोफेशनल की पहली कार्यशाला का यहां सितंबर के अंतिम सप्ताह में आगाज किया गया। संतोषप्रद जीवनशैली को सुनिश्चित करने वाली आवर्तनशील खेती की अवधारणा से दुनिया को परिचित कराने वाले प्रेम सिंह की अगुवाई में हुई पहली कार्यशाला में ‘‘खेती क्यों और कैसे हो’’ इसका व्यवहारिक ज्ञान कराया गया।
चार दिवसीय कार्यशाला की सफलता से उत्साहित प्रेम सिंह और उनकी प्रशिक्षण टीम ने इस तरह की अनूठी कार्यशालाओं का सिलसिला जारी रखने का फैसला किया है। कार्यशाला के संचालक जितेन्द्र गुप्ता बताते हैं कि पर्यावरण संकट को देखते हुये अब विभिन्न क्षेत्रों के प्रोफेशनल खेती की ओर बढ़ रहे हैं। लेकिन खेती किसानी के हुनर से अनभिज्ञ होने के कारण उन्हें इस विधा के सामान्य व्यवहारिक ज्ञान की दरकार होती है। उन्होंने कहा कि इस जरूरत को महसूस करते हुये अब हर महीने चार दिवसीय प्रशिक्षण कार्यशाला का आयोजन करने की कार्ययोजना बनायी गयी है।


प्रेम सिंह का मानना है कि किसानी ही एकमात्र ऐसा कार्य है जो प्रकृति की सेवा करते हुये पर्यावरण को संतुलित बनाने एवं मानव जीवन की पूर्णता का अहसास कराता है। वह बताते हैं कि उन्होंने 1987 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से दर्शन शास्त्र में एमए की पढ़ाई पूरी करने के बाद बांदा स्थित अपने पुश्तैनी गांव बड़ोखर खुर्द में नयी अवधारणाओं पर आधारित खेती करना शुरु किया था। उन्होंने बताया कि पिछले तीन दशक से जारी प्रयोगधर्मी कृषि के दौरान ही आवर्तनशील पद्धति को विकसित किया गया। उनके फार्म हाऊस पर अब इस पद्धति से खेती सीखने के लिये दो दर्जन से अधिक देशों के किसान और छात्र हर साल नियमित रूप से आते है।

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गौरतलब है कि सतत प्रयोगों पर आधारित आवर्तनशील पद्धति से खेती के प्रशिक्षण के व्यवस्थित पाठ्यक्रम को युवा किसान जितेन्द्र गुप्ता ने तैयार किया है। अपने तरह के इस अनूठे प्रशिक्षण पाठ्यक्रम में फार्म डिजाइनिंग, सिंचाई एवं जल प्रबंधन, पशुपालन और जैविक खाद निर्माण सहित खेती से जुड़े विभिन्न कार्यों को सीखने समझने का कोर्स डिजाइन किया है। इसमें तालाब निर्माण के महारथी और बुंदेलखंड क्षेत्र में एक हजार से अधिक तालाब बनवाने वाले प्रगतिशील किसान पुष्पेन्द्र भाई जल प्रबंधन के गुर सिखाते हैं।

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वहीं, बागवानी विशेषज्ञ, पंकज बागवान फल एवं सब्जियों के बाग लगाने के तौर तरीके बताते हैं। जबकि कृषि विशेषज्ञ शैलेन्द्र सिंह बुंदेला, किसानों को खुद अपने फार्म पर ही जैविक खाद बनाने के गुर सिखाते हैं। इसके अलावा प्रेम सिंह, ‘खेती क्यों और कैसे’ जैसे मूलभूत सवालों के जवाब अपने अनुभवजन्य ज्ञान से देकर संतृप्त एवं संतोषप्रद जीवनशैली से प्रशिक्षुओं को अवगत कराते हैं।
अब बात उन प्रोफेशनल की, जिन्होंने अपने काम से पूर्ण संतुष्टि नहीं मिलने के कारण कोरोना काल में जीवन की दिशा और दशा बदलने का फैसला कर आवर्तनशील खेती के प्रशिक्षण में हिस्सा लिया। ताईवान में पिछले डेढ़ दशक से रह रहे राजीव सिंह और उनकी पत्नी साक्षी वहां की एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में ऊंचे ओहदे पर कार्यरत थे। सिंह बताते हैं कि पैसे की पर्याप्त उपलब्धता के बावजूद उनका परिवार जीवन में संतुष्ट नहीं था। खेती किसानी को पूर्ण एवं तृप्त जीवन का आधार मानते हुये राजीव ने इस साल जनवरी में अपनी नौकरी छोड़कर भारत में खेती करने का फैसला किया।

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स्वदेश वापसी की मुकम्मल तैयारी करने के बाद मार्च में कोरोना संकट के कारण लॉकडाउन की वजह से उनकी योजना खटाई में पड़ गयी। गांव में बसने के लिये संकल्पबद्ध राजीव और उनकी पत्नी ने हालात से हिम्मत न हारते हुये गत जून में ताईवान के दक्षिणी राज्य पिंग तुंग के लिन लाऊ गांव का रुख किया। फिलहाल उनका परिवार गांव की एक वृद्ध महिला किसान जॉय लिन का सहारा बन कर उसके साथ खेती-बाड़ी का काम कर रहा है।
राजीव और साक्षी ने प्रेम सिंह के बाग में आयोजित कार्यशाला में वीडियो काॅफ्रेंसिंग के जरिये शिरकत करते हुये बताया कि वह लॉकडाउन की बाध्यतायें खत्म होने के बाद स्वदेश वापसी के अपने फैसले पर अमल करेंगे। उन्होंने बताया कि वह भारत में अपने परिवार के साथ मध्य प्रदेश के रीवां जिले में अपने गांव में रह कर ही प्रकृति की सेवा करते हुये शेष जीवन को पूर्ण संतुष्टि के साथ बिताना चाहते हैं।

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इसी प्रकार गुजरात में बतौर फैशन डिजाइनर अपना कारोबार जमा चुके रोहित दुबे को भी कोरोना संकट ने शहरी जीवन शैली की अपूर्णता के बारे में सोचने पर मजबूर कर दिया। दुबे बताते हैं कि लॉकडाउन के दौरान उन्हें उत्तर प्रदेश के जालौन जिले में स्थित अपने पुश्तैनी गांव आना पड़ा। उन्होंने बताया कि इस दौरान खुद को खेती से जोड़ने के बारे में सोचने के बाद मैं इस विधा के गुर सीखने के लिये प्रेम भाई के बाग तक पहुंच गया। दुबे ने अब अपनी 50 बीघा पुश्तैनी जमीन पर अवर्तनशील पद्धति पर आधारित फार्म हाऊस बनाने का काम शुरु कर दिया है। कुछ ऐसी ही कहानी मध्य प्रदेश की युवा लोक गायिका बेबी रानी प्रजापति की भी है।

लोक गायिका ने नयी सोच के साथ खेती शुरु कर दी

छतरपुर की निवासी बेबी रानी ने भी लोक गायिकी के अपने काम को जारी रखते हुये अपने पुश्तैनी गांव में नयी सोच के साथ खेती शुरु कर दी है। साथ ही वह लोकगीतों के माध्यम से जैविक खेती के प्रति किसानों को जागरुक भी करेंगी। कार्यशाला में दिल्ली एवं हरियाणा के कुछ छात्रों, पत्रकारों और मध्य प्रदेश के ओरछा के कुछ आदिवासी ग्रामीणों ने भी हिस्सा लेकर जैविक खेती की बारीकियों को समझा। प्रशिक्षण के कोर्स डिजाइनर जितेन्द्र गुप्ता ने बताया कि उन्होंने 12वीं कक्षा की पढ़ाई पूरी करने के साथ ही किसान बनने का फैसला कर लिया था। पिछले चार साल से वह खुद प्रेम सिंह के फार्म पर आवर्तनशील पद्धति से जैविक खेती सीख रहे हैं। खेती में अनवरत प्रयोगों के जरिये इस आवर्तनशील पद्धति को कारगर बनाने के बाद 26 वर्षीय गुप्ता अब उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों में किसानों को जैविक खेती का प्रशिक्षण देते हैं।

खेती में आत्मनिर्भर बनाने का एकमात्र रास्ता आवर्तनशील खेती

आवर्तनशील खेती के बारे में प्रेम सिंह का दावा है कि खेती की इस विधा को पूर्णता के करीब माना जाता है। इस पद्धति में फार्म के तीन हिस्से कर एक भाग में पशुपालन, एक भाग में फल एवं सब्जियों के बाग लगाना और एक भाग में सभी प्रकार की स्थानीय फसलों की खेती की जाती है। उनका दावा है कि किसान को खेती में आत्मनिर्भर बनाने का एकमात्र रास्ता आवर्तनशील खेती ही है। इसमें सामान्य उपयोग में आने वाले लगभग सभी प्रकार के खाद्यान्न का उत्पादन एक ही फार्म हाऊस में किया जा सकता है। इस तरीके को अपनाने के बाद किसान की बाजार पर निर्भरता न्यूनतम हो जाती है और यही उसकी आर्थिक आत्मनिर्भरता का प्रमुख आधार बनता है।

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