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दिल्ली के सरकारी स्कूलों में दाखिला लेने में 5 वर्षों में आई 19% गिरावट

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दिल्ली के सरकारी स्कूलों में दाखिला लेने में 5 वर्षों में आई 19% गिरावट

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दिल्ली के सरकारी स्कूलों में दाखिला लेने में 5 वर्षों में आई 19%गिरावट

—राजकीय सरकारी स्कूलों के 9वीं में फेल होने वाले 3.5% छात्रों ने पत्राचार स्कूलों में दाखिला लिया

—दिल्ली के 3 विधायकों सही राम, सोम दत्त और शिवचरण गोयल ने नहीं उठाया कोई मुद्दा

—प्रजा फाउंडेशन ने ‘दिल्ली में सार्वजनिक विद्यालय शिक्षा की स्थिति’ पर जारी की रिपोर्ट

(नीता बुधौलिया) 

नई दिल्ली। दिल्ली नगर निगम (एमसीडी) स्कूलों के नामांकन में पिछले पांच वर्षों में (2014-15 से 2018-19), 19% तक गिरावट आई है। दिल्ली नगर निगम (एमसीडी) स्कूलों में कक्षा 1 में नामांकन, 2010-11 की तुलना में 2018-19 में 45% तक गिर गया है, और काल-श्रेणी विश्लेषण इस संख्या को, 2021-22 में 53% तक गिरने का पूर्वानुमान करता है। खास बात यह है कि 2017-18 में दिल्ली के सरकारी स्कूलों के कक्षा 9वीं में दाखिला लेने वाले 2,89,682 छात्रों में से 40% छात्र (1,16,149) 2018-19 में कक्षा 10वीं तक नहीं पहुंच पाए। राजकीय सरकारी स्कूलों में सी.सी.ई के नतीजे दर्शाते है कि कक्षा 6 वीं   में 75%, 7 वीं में  67% और 8वीं में 70% छात्र, ग्रेड सी में या उससे नीचे हैं। 2017-18 में राजकीय सरकारी स्कूलों के 9वीं में फेल होने वाले छात्रों (1,16,149) में से केवल 3.5% (4,037 छात्र) ने 2018-19 में पत्राचार स्कूलों के 10वीं कक्षा में दाखिला लिया। एक घरेलू सर्वेक्षण के अनुसार, दिल्ली में उत्तरदाताओं ने 2019 में शिक्षा से संबंधित खर्चों पर औसतन 8.62% खर्च किया। इसके अलावा दिल्ली के 3 विधायकों, सही राम, सोम दत्त और शिवचरण गोयल ने 2015 से 2018 तक, शिक्षा के विषय पर कोई मुद्दा नहीं उठाया।

9वीं कक्षा के 40% छात्र परीक्षाओ में असफल रहे

बुधवार को आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान प्रजा फाउंडेशन ने ‘दिल्ली में सार्वजनिक (विद्यालय) शिक्षा की स्थिति’ पर अपनी रिपोर्ट जारी की। प्रक्षेपण के दौरान, इस बात पर जोर दिया गया कि सरकारी स्कूलों में सीखने के परिणामों में सुधार के लिए विभिन्न योजनाओं, बुनियादी ढांचे में सुधार और भारी बजटीय आवंटन के बावजूद, छात्रों को स्कूलों में बनाए रखना, एक बड़ी चुनौती है। यह ध्यान रखना जरूरी है कि राजकीय सरकारी स्कूलों में 1,16,149 छात्र कक्षा 9वीं (शैक्षणिक वर्ष 2017-18) से 10वीं (शैक्षणिक वर्ष 2018-19) में नहीं गए। इसका सीधा मतलब यह है कि 9वीं कक्षा के 40% छात्र परीक्षाओ में असफल रहे।
“मार्च 2019 में कक्षा 12 वीं की बोर्ड परीक्षाओं के दौरान, राज्य के सरकारी स्कूलों ने 94.24% उत्तीर्ण की सूचना दी, परन्तु यह बड़ी तस्वीर का एक छोटा हिस्सा प्रस्तुत करता है। हमें यह भी ध्यान में रखना है कि, सरकारी स्कूलों में 12वीं कक्षा तक पढ़ाई करने वाले कुल छात्रो की संख्या, आधे से भी कम थी, यानी 9वीं कक्षा की तुलना में केवल 45%”, प्रजा  फाउंडेशन के निदेशक मिलिंद म्हस्के ने कहा ।

राज्य सरकार के पास-आउट भी के.वी. की तुलना में कम

इसके अलावा, सीबीएसई की 10वीं बोर्ड परीक्षा दोबारा शुरू होने के बाद, मार्च 2017 में उत्तीर्ण प्रतिशत 92.44% से घटकर मार्च 2018 में 68.90% हो गया। मार्च 2019 में 71.58% के साथ थोड़ा सुधरा हुआ लेकिन दो साल पहले की तुलना में कम था। राज्य सरकार के पास-आउट भी के.वी. की तुलना में लगातार कम रहा है (के.वी स्कूलों  का पास-आउट 2017 में 99.83%, 2018 में 97.03% और 2019 में 99.79% था)| इस तरह के आँकड़े हमारे लिए चिंता का विषय हैं। हम भारत को भविष्य के लिए कैसे तैयार करेंगे, जब हमारे युवा, बड़ी संख्या में अपनी शिक्षा पूरी नहीं करेंगे? यदि उनके पास बुनियादी कौशल और ज्ञान की कमी है तो उनका भविष्य किस तरह का होगा? क्या वे भविष्य में व्यवहार्य तरीके से खुद को और अपने परिवारों को आर्थिक रूप से समर्थन दे पाएंगे?” प्रजा फाउंडेशन की संस्थापक और प्रबंध न्यासी, निताई मेहता ने पूछा।

पत्राचार माध्यम से 10वीं कक्षा की परीक्षा में 68 % छात्र फेल

प्रजा फाउंडेशन की संस्थापक निताई मेहता मेहता ने यह भी कहा कि, चुनौती जैसी शिक्षा योजनाओं के बावजूद (जो छात्रों के सीखने के स्तर में सुधार लाने के लिए हैं ),छात्र बाहरी परीक्षाओं में अच्छा प्रदर्शन करने में असमर्थ हैं । यह राज्य के सरकारी स्कूलों में सतत और व्यापक मूल्यांकन (सी.सी.ई) परिणामों में भी स्पष्ट है, जहां 2018-19 में, 6टी कक्षा में 75%, 7वी कक्षा में 67% और 8वी कक्षा में 70% छात्रों को ग्रेड -सी (60% और उससे नीचे) मिला। इसके अतिरिक्त, राज्य की ‘पत्राचार’ शिक्षा योजना (जो 8वीं या 9वीं कक्षा में फेल हुए छात्रों को सीधे 10वीं की परीक्षा के लिए आवेदन देने की अनुमति देता है। उसमें केवल 4,037 छात्रों ने (2018-19 में) 10वीं में दाखिला लिया। यह 2017 में 9वीं कक्षा में फेल हुए 1,16,149 छात्रों में से केवल 3.5% है। इसके अलावा 2017-18 में सरकारी स्कूलों के 11वीं कक्षा में फेल हुए छात्रों में से केवल 17% छात्र ने 2018-19 में 12वीं कक्षा में दाखिला लिया। हालांकि पिछले साल की तुलना में ‘पत्राचार’ के पास-प्रतिशत में सुधार आया है, लेकिन पत्राचार माध्यम से 10वीं कक्षा की परीक्षा में 68% छात्र फेल हुए।

विधायकों ने शिक्षा से संबंधित कोई मुददा नहीं उठाए

“इन सबके बावजूद निर्वाचित प्रतिनिधि इस विषय को गंभीरता से नहीं ले रहे हैं । दिल्ली के 3 विधायकों ने पिछले 4 वर्षों (2015-2018) में शिक्षा से संबंधित कोई मुद्दे नहीं उठाए । संस्था ने चिंता ज़ाहिर करते हुए कहा कि, दिल्ली में विधायकों द्वारा पिछले 4 वर्षों (2015-18) में छात्रों का स्कूल छोड़ने के संबंध में, शिक्षा से संबंधित कुल मुद्दों में से केवल 5 प्रश्न उठाए गए थे, हालांकि यह एक गंभीर चिंता का विषय है।

पार्षद भी िफसडडी, नहीं उठाए सवाल  

15 पार्षदों (एनडीएमसी से 3, ईडीएमसी से 7 और एसडीएमसी से 5) ने अपने कार्यकाल (2017-19) की शुरुआत से शिक्षा के मुद्दे पर एक भी सवाल नहीं पूछा। यह भी चिंताजनक है कि प्रजा द्वारा हंसा रिसर्च को कमीशन दिए गए एक सर्वेक्षण के अनुसार दिल्ली के 27,121 परिवारों   में से 78% उत्तरदाताओं ने कहा कि वे सरकारी स्कूलों से अन्य स्कूलों में  दाखिला लेना चाहते हैं, “सामर्थ्य सबसे बड़ी बाधा (77% उत्तरदाताओं के अनुसार ) है, बच्चों को दूसरे स्कूलों में भेजने के लिए” श्रम मंत्री के पूर्व सलाहकार और शासन के निदेशक एम.सी वर्मा ने कहा । मेहता ने निष्कर्ष निकालते  हुए कहा कि, ‘बच्चों तक समपूर्ण शिक्षा पहुंचने पर ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिए ताकि वे भविष्य में करियर/व्यवसाय के बेहतर अवसर पाकर अपने जीवन और अपने आसपास के लोगों के जीवन  में सुधार ला सकें।

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