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कश्मीर घाटी में पहुंचा पत्रकारों का दल… जाने आंखों देखा हाल’

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कश्मीर घाटी में पहुंचा पत्रकारों का दल… जाने आंखों देखा हाल’

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-कश्मीर घाटी में पनप रहीं हैं आशंकाओं के बीच आकांक्षाएं

—ज़मीनी हालात का जायजा लेने के लिए एनयूजे का दल पहुंचा कश्मीर

— जम्मू, लद्दाख एवं कश्मीर घाटी का दौरा किया
——राज्यपाल सत्यपाल मलिक से की मुलाकात, विभिन्न मुदृदों पर चर्चा

(खुशबू पाण्डेय)

नयी दिल्ली/श्रीनगर  :  जम्मू कश्मीर से संविधान के अनुच्छेद 370 के निष्प्रभावी होने और 35 ए के समाप्त होने के बाद जम्मू और लद्दाख में लोगों में खुशी और आशा की भावना है लेकिन कश्मीर घाटी सहमी सी है। लोगों में अजीब सा खौफ कायम है लेकिन उसीके बीच आकांक्षाओं के अंकुर भी फूटने लगे हैं।
अनुच्छेद 370 की धारा दो और तीन तथा 35 ए के समाप्त होने के एक माह बाद ज़मीनी हालात का जायजा लेने के लिए नेशनल यूनियन आफ जर्नलिस्ट्स (इंडिया) के नेतृत्व में विभिन्न मीडिया संस्थानों के पत्रकारों के तीन प्रतिधिनिधिमंडलों ने जम्मू, लद्दाख एवं कश्मीर घाटी का दौरा किया। देश के राजनीतिक गलियारों में कश्मीर घाटी को लेकर प्रचारित बातों का ज़मीनी आकलन करने पर अनेक दिलचस्प पहलू सामने आये। प्रतिनिधिमंडल ने जम्मू कश्मीर के राज्यपाल सत्यपाल मलिक से भी मुलाकात की और विभिन्न मुद्दों पर चर्चा की।
पूरे जम्मू कश्मीर और लद्दाख में समग्रता से देखा जाये तो ये इलाका बदलाव और उम्मीद की एक नई करवट ले रहा है। जम्मू में विकास की नई उम्मीद जागी है जबकि जम्मू कश्मीर से अलग केंद्र शासित राज्य बनने को लेकर लददाख में आम आदमी खुलकर खुशी जता रहे हैं। पर कश्मीर घाटी में आम आदमी की जिंदगी जहां आशा और आशंका में लिपटी हुई नजर आती है। घाटी में शांतिपूर्ण चुप्पी छाई है तथा अलगवादियों और आतंकवादियों की ओर से बंदूक, पत्थरबाजी भड़काऊ पोस्टरों, बयानों और हरकतों से डर का वातावरण बनाने की कोशिश की जा रही है।
कश्मीर घाटी में आये इस छह सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल ने श्रीनगर सहित कश्मीर के अलग अलग क्षेत्रों  में अल्पसंख्यक सिख एवं हिन्दू समुदाय, शिया समुदाय,गांव के पंच और  सरपंचों, किसानों, छात्रों,शिक्षित बेरोजगार युवकों, सुरक्षा कर्मियों,  पत्रकारों, वकीलों, राजनीतिक कार्यकर्ताओं सहित करीब डेढ सौ लोगों से अलग  अलग मुलाकातें कीं और उनके विचारों को जानने का प्रयास किया। इस संवाद में कई चौकाने वाली बातें उभर कर सामने आईं। कश्मीर में संवाद के दौरान अधिकांश लोग अपनी पहचान उजागर करने के लिए तैयार नहीं थे।
जहां एक ओर लोगों में जहां अपनी रोजी रोटी को लेकर चिन्ता नजर आई वहीं पाकिस्तान पोषित आतंकवाद और अलगाववादियों के साथ साथ कश्मीर के स्थानीय नेताओं के खिलाफ नाराजगी दिखाई दी। यह भी पता चला कि कश्मीर में अधिकांश लोगों को अनुच्छेद 370 के नफे नुकसान के बारे में अधिक जानकारी नहीं है। उन्हें यह भी नहीं पता कि 370 एवं 35 ए के हटने से उनका वाकई में क्या नुकसान हुआ है। अधिकांश लोग आतंकवादियों, अलगाववादियों और  पाकिस्तान के मुद्दे पर कैमरे के सामने तो खुलकर बात करना नहीं चाहते लेकिन  कैमरा हटते ही पाकिस्तान पोषित आतंकवाद और भय के माहौल के प्रति उनका  गुस्सा फट पड़ता है।
बदले माहौल में लोगों में उनके भविष्य को लेकर आशा और आशंका में लिपटी मिलीजुली राय देखने सुनने को मिली। श्रीनगर में लोगों में भविष्य को लेकर कई सवाल हैं और इन सवालों में भी विकास और रोजगार से जुडे सवाल अधिक हैं।  शियाओं ने एक पृथक शिया वक्फ़ बोर्ड बनाने की, युवाओं ने आधुनिक उद्योग धन्धों की स्थापना और रोज़गार के बेहतर अवसर लाने की तो किसानों ने सेब एवं अन्य उपज के बेहतर दाम की मांग की।
जम्मू कश्मीर के लोगों में राज्य के प्रमुख स्थानीय राजनीतिक दलों और उनके नेताओं के खिलाफ भारी नाराजगी देखने को मिली। पूर्व मुख्यमंत्री फारूख अब्दुल्ला,महबूबा मुफ्ती सहित राज्य के प्रमुख नेताओं और अलगवादी नेता की नजरबंदी के सवाल पर लोगों की यह आम धारणा है कि अब्दुल्ला और मुफ्ती परिवारों ने कश्मीरियों के साथ जितना छल किया उतना किसी ने नहीं किया। जम्मू और लद्दाख के लोगों में भी घाटी के नेताओं को लेकर साफ नाराजगी थी। दोनों जगह हर कोई यह बात कहता हुआ मिला कि कश्मीर के नेताओं ने उनके क्षेत्र के साथ हमेशा धोखा किया और विकास से दूर रखा।
विश्वसनीय राजनीतिक नेतृत्व का संकट कश्मीर की सबसे बडी समस्या उभर कर सामने आ रही है। राज्य में अब कोई भी एक ऐसा सर्वमान्य नेता दिखाई नहीं देता जिस पर जम्मू कश्मीर की जनता को भरोसा हो। दिलचस्प बात यह भी रही कि लोग प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तथा गृहमंत्री अमित शाह को ऐसा निर्णायक नेतृत्व मानते हैं जो देश के लिए किसी भी हद तक जाने का हौसला और अपना नजरिया रखता है।
स्थानीय लोगों के बीच जमीन और रोजगार को लेकर कई सवाल और आशंकाएं है। इसलिए इन दोनों मुद्दों पर सरकार से ठोस पहल की उम्मीद कर रहे हैं। घाटी में इंटरनेट और मोबाइल नेटवर्क पर पांबदी से लोग खासकर युवा झुंझलाए हुए हैं। हालांकि प्रशासन ने लैंडलाइन फोन चालू कर तथा फोन बूथ लगाकर लोगों को राहत देने की कोशिश की है। एक दिलचस्प बात जो जगह जगह युवाओं से बात करने पर उभरी वह यह कि घाटी के युवाओं में इन नेताओं की नज़रबंदी से ज्यादा अपने स्मार्टफोन के बंद होने की चिंता है। वे खुल कर कह रहे हैं कि कश्मीर के साथ विश्वासघात करने वालों के साथ सरकार चाहे जो भी करे पर उनके मोबाइल फोन एवं इंटरनेट से पाबंदी हटा दे। युवाआें के मन में देश के बाकी हिस्सों में हमले हाेने का डर बैठा है और उनका यह भी कहना है कि 370 और 35 ए तो अब लौट कर नहीं आएगा लेकिन उनके रोज़गार के लिए सरकार क्या करेगी।

 


सिखों, किसानों, व्यापारियों और पंचायतों के प्रतिनिधियों के साथ बातचीत में पता चला कि जम्मू कश्मीर में 370 एवं 35 ए के पर्दाें के पीछे भयंकर भ्रष्टाचार व्याप्त रहा। बीते ढाई दशकों में श्रीनगर की डल झील की सफाई के लिए हजारों करोड़ रुपए आये लेकिन थोड़े से हिस्से में जलकुंभी निकालने के अलावा कुछ नहीं किया गया। सरकारी नौकरियों में भर्ती की प्रक्रिया में भी बहुत भ्रष्टाचार रहा। वहां कई दशकों से सत्ताधारी दलों के कार्यकर्ताओं को नौकरी देकर प्रशासन को पूरी तरह से राजनीतिक बना दिया गया है। अधिकतर कर्मचारी नेशनल कांफ्रेंस एवं पीपुल्ड डेमोक्रेटिक पार्टी के काडर हैं। जम्मू कश्मीर बैंक की भर्ती का घोटाला इसी का एक उदाहरण है जहां प्रवेश परीक्षा एवं साक्षात्कार में पास हुए 580 युवाओं की जगह पीडीपी के कार्यकर्ताओं को नियुक्ति पत्र थमा दिये गये थे।
जम्मू कश्मीर पंचायत राज फोरम के नेता बशीर मलिक ने बताया कि केन्द्र शासित प्रदेश घोषित होने के बाद घाटी में उनके बैनर तले चुने गये डेढ़ हजार से अधिक पंच और करीब ढाई सौ सरपंच बीते 15 अगस्त को अपने अपने गांवों में तिरंगा फहराना चाहते थे लेकिन प्रशासन ने झंडे दिये ही नहीं। उन्होंने राज्य प्रशासन के ढांचे में अलगाववादियों एवं नियंत्रण रेखा पार के एजेंटो के दबदबे का आरोप लगाते हुए मांग की कि राज्य में बड़े पैमाने पर तबादले किये जाने चाहिए। सिख व्यापारी नेता कुलदीप सिंह ने कहा कि पाकिस्तानी एजेंटों से राज्य प्रशासन के पुराने अफसरों की सांठगांठ ने घाटी में आम लोगों को नये बदलाव को अस्वीकार करने का दबाव बनाया है। उन्हीं की शह पर आतंकवादी और अलगाववादी बंदूक की नोक पर, भड़काऊ बयानबाजी,पत्थरबाजी और  हरकतों से राज्य में डर का वातावरण बनाने की लगातार कोशिश कर रह हैं।

श्रीनगर और दक्षिणी कश्मीर कई हिस्सों में इस डर के चलते लोगों के कामधंधे लगभग ठप्प पडे हैं। वजह लोगों ने अपनी दुकाने खोलने की कोशिश की तो आतंकवादियों ने दो तीन दुकानदारों और कारोबारियों की हत्या कर डर पैदा करने की कोशिश की। सरकार आठ हजार करोड़ रुपये का सेब खरीद पैकेज देते हुए बगानों से सेब खरीद के लिए कदम बढ़ा रही है लेकिन अलगाववादी तत्व ट्रक तथा ड्राइवरों पर हमले की योजनाएं बना रहे हैं। अनंतनाग क्षेत्र में इसी तरह के एक हमले में ट्रक ड्राइवर की जान भी गई है। अलगाववादियों द्वारा दुकानदारों और कारोबारियों की हत्या और उन पर हमलों को लेकर लोगों में नाराजगी है।

  केंद्रीय सुरक्षा बलों को लेकर शिकायतें नगण्य

केंद्रीय सुरक्षा बलों को लेकर यूं तो शिकायतें नगण्य हैं पर कई नौजवान ऐसे मिले जिन्हें इस बात की शिकायत थी कि पूछताछ के नाम पर स्थानीय पुलिस का रवैया ठीक नहीं रहता। वैसे राज्य में सरकार की ओर से कोई बंद नहीं है न दुकानें और न अखबार। दुकानें सुबह शाम पूरी और दिन में थोड़ा शटर खोलकर चल रही हैं। दवा की दुकानों पर भीड़ दिखायी दी। इस बात का पुख्ता सबूत यह भी है कि सभी एटीएम खुले हैं और लोग पैसे निकाल रहे हैं, यानी लेनदेन चल रहा है। सड़कों पर यातायात भी खूब है। कई सड़कों पर आम दिनों की तरह से जाम मिलता है। महिलाएं, लड़कियां भी खूब अाराम से गाड़ी चलाती मिल जातीं हैं।

राज्यपाल से की पत्रकारों से मुलाकात

राज्यपाल मलिक से मुलाकात में पत्रकारों ने उन्हें अपनी बातचीत के निष्कर्षों को साझा किया। श्री मलिक ने भी जम्मू कश्मीर के लोगों के कल्याण के लिए उठाये जा रहे कदमों की जानकारी दी। उन्होंने कहा कि मोबाइल एवं इंटरनेट पर पाबंदी के कारण कश्मीर में एक भी जान नहीं गयी। उन्होंने हालात के शीघ्र ही सामान्य होने और जल्द ही मोबाइल एवं इंटरनेट से पाबंदी हटाये जाने की उम्मीद जतायी। पत्रकारों के प्रतिनिधिमंडल में वरिष्ठ पत्रकार हितेश शंकर, नेशनल यूनियन आफ जर्नलिस्ट्स (इंडिया) के राष्ट्रीय महासचिव मनोज वर्मा, राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष राकेश आर्य, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हर्षवर्धन त्रिपाठी, दिल्ली जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन के महासचिव सचिन बुधौलिया, उपाध्यक्ष आलोक गोस्वामी शामिल थे।

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