Thursday, 18 January 2018
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स्टोरकीपर कैसे बना अरबपति

यूपी में बिजली की हालत किसी से छिपी नहीं है। पॉवर कॉरपोरेशन की बिगड़ी सेहत भी जगजाहिर है। ऐसे में सूबे में बिजली के दर्द की मारी जनता को सूकून देने के लिए जो थोड़े बहुत सरकारी वादे हुए भी वो भी तन्त्र के मकड़जाल में कुछ यूं उलझ कर रह गए कि हालात बदलना तो दूर बदलाव के नाम पर कुछ भी नहीं हुआ। सूबे में ट्रांसफार्मर लॉबी का दबाव इस कदर है कि उसके सामने खुद सूबे के मुखिया भी बेबस ही नजर आते हैं।

2012 में उत्तर प्रदेश की कमान सबसे युवा मुख्यमंत्री के हाथों गई तो बेहतरी की उम्मीद भी जगी। भारी बहुमत से सत्ता हासिल करने वाले अखिलेश यादव ने सत्ता संभालते ही सूबे की सबसे कमजोर नब्ज पर हाथ रखा और वादा किया कि बिजली को सुधार देंगे। सुधार की राह में सरकार ने कदम आगे बढ़ाया तो नजर सबसे पहले उन घटिया ट्रांसफार्मर्स पर गई जो हर रोज फुंक जाया करते थे। मुख्यमंत्री ने ऐलान किया कि घटिया ट्रांसफार्मर सप्लाई करने वाली कंपनिया ब्लैक लिस्टेड की जाएंगी। बस इस ऐलान के बाद ही शुरु हुआ तन्त्र, राजनीति, और भ्रष्ट कारपोरेट लॉबी के गठजोड़ का ऐसा खेल जिसने मुख्यमंत्री की मंशा पर पानी फेर दिया।

मुख्यमंत्री के सख्त ऐलान के बाद सक्रिय हुई ट्रांसफार्मर लॉबी ने उस वक्त के यूपीपीसीएल के चेयरमैन अवनीश अवस्थी को हटवा दिया और इस भ्रष्ट तंत्र ने एपी मिश्रा को एमडी पावर कॉरपोरेशन बनवा दिया। ये वही एपी मिश्रा हैं जो पिछली सरकार में भी ट्रांसफॉर्मर खरीद के लिए जिम्मेदार थे और बिजली विभाग में कई प्रमुख पदों पर रहे हैं। बात करें तो अवनीश अवस्थी ने घटिया ट्रांसफार्मर सप्लाई करने वाली कंपनियों को नोटिस भेजी थी। इन कंपनियों में सबसे उपर नाम था एक्यूरेट प्राइवेट लिमिटेड का, जिस पर समाजवादी पार्टी के एक बड़े नेता का वरदहस्त है और जिनके बारे में कहा जाता है कि वो बीजेपी को छोड़कर लगभग सभी सियासी दलों में रह चुके है। स्टैंडिंग कमेटी ऑफ क्वालिटी कंट्रोल मानिटरिंग के सदस्य अवधेश वर्मा का दावा है कि उसी नेता के दबाव में अवनीश अवस्थी हटाए गए थे इससे पहले 9 सितंबर 2011 में तत्कालीन यूपीपीसीएल चेयरमैन नवनीत सहगल ने एमपी पॉवर कॉरपोरेशन को पत्र लिखकर कहा था कि एक्यूरेट कंपनी के 500 में से 127 ट्रांसफार्मर क्षतिग्रस्त हुए हैं जो नाकाबिले बर्दाश्त है। लिहाजा उन पर और उनका साथ देने वाले पर कार्रवाई की जाए।

इसके बाद 16 सितंबर 2011 को निदेशक वितरण जवाहर लाल ने आदेश दिया कि एक्यूरेट कंपनी को आदेशित 6650 ट्रांसफार्मर सप्लाई करने का ठेका रद्द किया जाए लेकिन हुआ कुछ भी नहीं साफ है पुरानी सरकार और नई सरकार दोनों के दौरान एक्यूरेट कंपनी पर शिकंजा कसने और घटिया ट्रांसफार्मर की सप्लाई रोकने के लिए ना केवल कोशिशें हुईं बल्कि आदेश भी जारी हुए लेकिन बावजूद इसके हालात नहीं बदले। सवाल बड़ा ये आखिर ये सबकुछ कौन करा रहा है और किसके दबाव में हो रहा है क्या वाकई ट्रांसफार्मर लॉबी इतनी ज्यादा ताकतवर है कि उसके आगे किसी की नहीं चलती।

मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने घटिया ट्रांसफार्मर सप्लाई करने वाली कंपनियों पर शिकंजा कसने के निर्देश दिए तो कार्रवाई आगे भी बढ़ी। तत्कालीन चेयरमैन अवनीश अवस्थी ने कई कंपनियों को नोटिस भेजा लेकिन खुद अवस्थी को ही जाना पड़ा। 23 फरवरी 2013 को क्वालिटी कंट्रोल पर बनी स्टैंडिंग कमेटी ने पॉवर कॉरपोरेशन से कहा कि ट्रांसफार्मर क्षतिग्रस्त होने की दर अगर एक फीसदी से ज्यादा हो तो उस कंपनी को काम ना दिया जाए। इस कमेटी में आईआईटी कानपुर के प्रोफेसर एससी श्रीवास्तव भी थे लेकिन इस सुझाव को कूड़ेदान में डाल दिया गया और भ्रष्ट तन्त्र से एक नया रास्ता निकाला गया और कहा गया कि अगर किसी कंपनी के ट्रांसफार्मर के क्षतिग्रस्त होने की दर 10 फीसदी ज्यादा हो तो उसे काम नहीं दिया जाएगा ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि एक्यूरेट कंपनी के ट्रांसफार्मर्स के क्षतिग्रस्त होने की दर 9 फीसदी से ज्यादा और 10 फीसदी से कम थी। इसी तरह 7 कंपनियों को योग्य बताया गया, इसमें टेक्निकल एसोसिएट्स का प्रतिशत 9.95, एक्यूरेट का 9.09, और लक्ष्मी ट्रांसफार्मर की दर 7.61 थी जबकि बाकी की 5 फीसदी से कम थी।

आपको बता दें कि देश भर में सिर्फ उन्हीं कंपनीज को ट्रांसफार्मर सप्लाई का काम मिलता है जिनकी क्षतिग्रस्तता की दर 3 फीसदी से कम होती है लेकिन यूपी में इसे 10 फीसदी किया गया है क्यों किया गया ये समझना मुश्किल नहीं है। उदाहरण के लिए आपको बता दें कि लक्ष्मी ट्रांसफार्मर कंपनी भी सरकार में काम कर रहे एक अधिकारी के भाई की है। सूबे में ट्रांसफार्मर सप्लाई के लिए मानक निर्धारित करने के लिए फैसला 4 जुलाई 2013 को हुआ और इससे महज एक दिन पहले ही यानी 3 जुलाई को क्वालिटी कंट्रोल मानिटरिंग कमेटी ने लिखकर कहा था कि 3-4 स्टार वाले ट्रांसफार्मर कंपनी को ही काम दिया जाए लेकिन उसे नहीं सुना गया।

साफ है कि पॉवर कॉरपोरेशन में नेता, अफसर, और कॉरपोरेट लॉबी का खेल खुलेआम चल रहा है और ये तन्त्र शायद अब इतना प्रभावशाली है कि इसके आगे खुद सीएम के निर्देश भी काम नहीं आ रहे हैं। एक्यूरेट ट्रांसफार्मर कंपनी पर सरकारी मेहरबानी की बात नई नहीं है। इसके मालिक सीएल शर्मा गाजियाबाद के सिहानी इलाके के रहने वाले हैं। बताते हैं कि शर्मा साहब ने 1980 तक गाजियाबाद की एक फैक्ट्री में स्टोर कीपर की नौकरी की। 1980 के बाद इन्होंने अपना काम करना शुरु किया। धीरे-धीरे शर्मा की कंपनी को राजनीतिक संरक्षण मिलना शुरू हुआ। कहा जाता है कि उस वक्त की कांग्रेस सरकार के एक ऊर्जा मंत्री की इनके ऊपर खासी मेहरबानी रही और उसी वक्त शर्मा के कारोबार ने रंग पकड़ा। इसके बाद यूपी में जो भी ऊर्जा मंत्री बना सीएल शर्मा से उसका नाता बना रहा। फिर चाहे वो एसपी के ऊर्जा मंत्री रहे हों या फिर लोकतांत्रिक कांग्रेस के, सभी ने एक्यूरेट ट्रांसफार्मर कंपनी को आउट ऑफ टर्न काम देना शुरु कर दिया। किसी ने भी नियम कानून नहीं देखे जबकि ये सरकारी रिपोर्ट्स की सचाई है कि एक्यूरेट ट्रांसफार्मर सबसे ज्यादा घटिया माने जाते हैं।

बावजूद इसके इस कंपनी को ना केवल काम मिला बल्कि तमाम आरोपों के बाद भी ट्रांसफार्मर्स की सप्लाई के लिए ये कंपनी पसंदीदा बनी रही। बताते हैं कि इस कंपनी में कई नेताओं की पार्टनरशिप भी है। जिसके चलते नोएडा और गाजियाबाद में अब सीएल शर्मा ने कई कंपनिया खोल ली हैं। इतना ही नहीं नोएडा ग्रेटर नोएडा में शिक्षा के क्षेत्र में भी सीएल शर्मा ने दखल दिया है और एक्यूरेट इंजीनियरिंग कॉलेज भी खोले हुए हैं। महज 33 साल में करोड़पति बनने वाले सीएल शर्मा की पूरी कहानी फिल्मी सी लगती है लेकिन इस कहानी से सवाल भी उठते हैं कि क्या वाकई एक मामूली सा स्टोर कीपर सिर्फ अपने मेहनत के दम पर इतने बड़े एम्पायर का मालिक बन सकता है।

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