Tuesday, 17 July 2018
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दिल्ली को मिली एक नई पहचान दिलदार दिल्ली


नई दिल्ली: 18 अप्रैल: दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने आज दिल्ली सचिवालय में दिल्ली की पहली टैगलाइन यानी कुछ शब्दों में इसकी पहचान की घोषणा की। इसके लिए एक प्रतियोगिता आयोजित कर लोगों से टैगलाइन भेजने को कहा गया था। निर्णायक मंडल ने विजेता के रूप में दिल्ली के अमित आनंद को चुना जिन्होंने श्दिलदार दिल्लीश् की टैगलाइन भेजी थी। दीक्षित ने उन्हें 50 हजार रुपए का प्रथम पुरस्कार प्रदान किया। इसके अलावा आठ अन्य श्रेष्ठ प्रतिभागियों को भी पुरस्कृत किया गया। दिल्ली पर्यटन और दिल्ली सरकार ने पिछले वर्ष दिल्ली को टैगलाइन देने के लिए भारतीय नागरिकों से प्रविष्टियां आमंत्रित की थी जिसमें 12,000 से अधिक प्रविष्टियां प्राप्त की गईं। इस अवसर पर दीक्षित ने कहा कि टैगलाइन - श्दिलदार दिल्लीश् अब दिल्ली की उदारता का सूचक बन गई है। यह टैगलाइन दिल्ली की तरह हमेशा लोगों की जुबान पर रहेगी। दिल्ली ऐतिहासिक और आधुनिक शहर है और यह टैगलाइन दिल्ली की सही भावना प्रदर्शित करती है। समारोह में दिल्ली के मंत्री डाॅ ़ अशोक कुमार वालिया, राज कुमार चैहान, हारून युसूफ और प्रोफेसर किरण वालिया, मुख्य सचिव दीपक मोहन सपोलिया, प्रधान सचिव डाॅ ़ एम ़एम ़ कुट्टी, दिल्ली परिवहन एवं पर्यटन निगम के अध्यक्ष मनीष चतरथ, महाप्रबंधन जी ़जी ़ सक्सेना, निगम के निदेशक तथा कई गण्यमान्य व्यक्ति मौजूद थे।

    दिल्ली में आने वाले पर्यटकों को दिल्ली के प्रति आकर्षित करने के लिए दिल्ली सरकार ने दिल्ली पर्यटन के साथ मिलकर यह सराहनीय कदम उठाया जिससे भविष्य में दिल्ली को नए नाम से जो कि, दिल्ली के इतिहास, संस्कृति, सांस्कृतिक, भौगोलिक, नवीनतम रहन-सहन और विभिन्नता में एकता लिए हुए, दिल्ली को एक अमली जामा पहनाने का नाम हो। दिल्ली अपने आप ही उस नाम को अपने में समाहित किए हुए आने वाले पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करेगी। इस नाम से दिल्ली का वास्तविक स्वरूप नजर आएगा जिसके कारण दिल्ली में पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा।

    दिल्ली एक पर्यटन नगरी है। यहां विरासत में मिली अनेक धरोहर हैं, जो कि अपने में अलग-अलग समयकाल को समाये हुए हैं। इनकी सुंदरता, कलाकारी व उन पर की गई नक्काशी आज भी जीवंत है। दिल्ली का कुतुब मीनार, लाल किला, पुराना किला, हुमायूं मकबरा आदि अपने समय की विश्व प्रसिद्ध धरोहर हैं जिसके कारण देश-विदेश से पर्यटक इनके आकर्षण से खिंचें चले आते हैं। दिल्ली एक ऐसा शहर है जिसमें आने वाले लोग यहां पर आकर अपने लिए रोजगार को प्राप्त करने के बाद यहीं पर बस जाते हैं। दिल्ली में सबके लिए जगह है इसी कारण यहां पर विभिन्नता में एकता देखी जा सकती है।

    दिल्ली सरकार द्वारा दिल्ली में पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए दिल्ली को विश्वस्तरीय ढंग से नवनिर्मित किया जा रहा है और आज के समय में दिल्ली का चहुंमुखी विकास भी हो रहा है। इस विकास में दिल्ली पर्यटन एवं परिवहन विकास निगम का भी सहयोग रहा है। विभिन्न मेलों/उत्सवों तथा नए-नए पर्यटन स्थलों को विकसित करने के और अन्य निगमों के साथ मिलकर इसको मूर्तरूप दिया जा रहा है।
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डीटीसी को चूना लगा रहे हैं सरकारी दबंग


नई दिल्ली, (वूमन एक्सप्रेस) राजधानी में 48 से 50 लाख लोगों को रोजाना सफर कराने वाले दिल्ली परिवहन निगम (डीटीसी) की बसों में करीब 60 हजार यात्री मुफ्त में सफर कर रहे हैं। ये मुसाफिर कोई गरीब या स्कूली बच्चे नहीं, बल्कि सरकार के श्दबंग्य हैं। ये सरकारी दबंग डीटीसी को रोजाना लाखों रुपये का सीधे चूना लगा रहे हैं। इनमें विभिन्न केंद्रीय मंत्रालयों की सुरक्षा में तैनात केंद्रीय सुरक्षा एजेंसियों व अर्द्धसैनिक बलों के जवान तथा दिल्ली पुलिस के दबंग शामिल हैं। इसमें 90 फीसदी दिल्ली पुलिस के कर्मचारी शामिल हैं। ये लोग स्टाप के नाम पर चढ़ते हैं और स्टाप ही बताकर उतर जाते हैं। अब तो हरियाणा और दिल्ली से सटे शहरों (नोएडा, गाजियाबाद, गुडगांव, फरीदाबाद, सोनीपत) के पुलिस के जवान भी स्टाप बताकर मुफ्त में सफर करने के आदी हो गए हैं।
दिल्ली में सार्वजनिक परिवहन सेवा के रूप में डीटीसी की बस और मेट्रो रेल का इस्तेमाल होता है। मेट्रो रेल में चूंकि, बगैर कूपन लिए यात्रा हो नहीं सकती, इसलिए दबंगों के लिए डीटीसी की सवारी ही सबसे मुफीद है। इस मुफ्त यात्रा को रोकने के लिए डीटीसी ने साल की शुरुआत में कोशिश भी की थी। अच्छे रिजल्ट भी मिलने लगे थे, लेकिन दिल्ली पुलिस के बदले तेवर से उन्हें पीछे हटना पड़ा। दिल्ली पुलिस ने बदला लेते हुए उल्टे डीटीसी बसों एवं ड्राइवरों के खिलाफ चालाना काटना शुरू कर दिया। हालात ये हो गई कि एक महीने के भीतर दर्जनों चालान भी कट गए। डीटीसी में तब के (वर्ष 2010-2011) अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक रहे नरेश कुमार ने सरकार स्तर पर यह मुद्दा भी उठाया। पुलिस वालों के लिए एक विशेष पास भी जारी करने की बात हुई, लेकिन सफलता नहीं मिली। आखिरकार, उन्होंने अपने स्तर पर एक अभियान छेड़ा और बेटिकट पुलिसवालों को पकडना शुरू कर दिया। इस अभियान के बीच बाकायदा कंडक्टर को अधिकार दिया गया कि वह कोई भी स्टॉप बताने वाले का आईकार्ड मांगे और उसका डिटेल रिकार्ड रजिस्टर में अंकित करें। यह अभियान तीन चार दिन चला ही था कि दिल्ली पुलिस वाले बदला लेना शुरू कर दिए। नतीजा यह हुआ कि चलती बस में ड्राइवर का चालान होने लगा। ड्राइवर बेल्ट लगाया है या नहीं, स्टॉप पर ठीक से बस खड़ी किया है या नहीं आदि बहाना बनाकर पुलिस वाले चालान काटना शुरू कर दिया। मामला तूल पकड़ते ही प्रबंध निदेशक नरेश कुमार ने तुरंत दिल्ली पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों से संपर्क किया और धड़ाधड़ काटे जा रहे चालान को रोक लगाने की अपील की। इसके बाद चालान काटने की प्रक्रिया बंद हुई। इसी के साथ डीटीसी ने पुलिसवालों पर जुर्माना काटने की अभियान भी कुछ दिनों के लिए रोक दिया। फिर क्या था, पुलिसवालों को छूट मिल गई और सरकारी दामाद की तरह बसों में मुफ्त की सैर करने लगे।
डीटीसी के नुकसान की बात करें तो सामान्य बसों का सबसे कम कीमत वाला टिकट 5 रुपये और वातानुकूलित बसों में 10 रुपये का है। अगर सबसे कम दूरी वाले इसी भाड़े को जोड़े तो 60 हजार लोगों की यात्रा से सामान्य बसों पर 3 लाख एवं वातानुकूलित लो-फ्लोर बसों पर यात्रा से 6 लाख रुपये तक रोजाना नुकसान हो रहा है। ज्यादा दूरी के टिकट की बात करें तो ये आंकड़ा और ज्यादा बढ़ जाता है। वैसे भी कम दूरी में तो कोई सफर करता नहीं। चूंकि, इन दबंगों को मुफ्त की सवारी पसंद है, इसलिए ज्यादा यात्रा वातानुकूलित बसों में ही होती है। मुफ्त की यात्रा से डीटीसी को भारी भरकम नुकसान हो रहा है। इसलिए एक बार फिर इसको लेकर कागजी घोड़े दौड़ाने शुरू हो गए हैं। डीटीसी के वरिष्ठ प्रबंधक (पीआर) शरत कुमार के मुताबिक सभी केंद्रीय सुरक्षा एजेंसियों, विभागों एवं पुलिस संस्थानों को इस बावत पत्र लिखा जा रहा है। किस विभाग के कितने लोग मुफ्त में यात्रा कर रहे हैं इसका मोटा मोटा सर्वे भी करवा लिया गया है। उन्हें स्पष्ट कहा जाएगा कि बसों में सफर करने वालों के लिए एक मुश्त रकम जारी किया जाए, इसके बदले उन्हें रियायती पास जारी कर दिए जाएंगे। क्योंकि, मुफ्त में सफर करने वाले इन दबंगों को सरकार की ओर से यात्रा भत्ता भी मिलता है।
48 से 50 लाख मुसाफिर प्रतिदिन करते हैं सफर
बता दें कि डीटीसी के बेड़े में 1275 वातानुकूलित लो-फ्लोर तथा 2506 गैर वातानुकूलित लो-फ्लोर बसों सहित कुल 5800 बसे शामिल हैं। ये बसे लगभग 48 से 50 लाख यात्रियों को प्रतिदिन 40 हजार फेरे लगाकर लगभग 10.20 लाख किलोमीटर की यात्रा कर उन्हें अपने गंतव्य तक पहुंचाती है। इसके एवज में मेट्रो रेल से करीब 20 लाख लो रोजाना सफर करते हैं।

दिल्ली पुलिस के लिए केंद्र से से बात करेंगे % रमाकांत गोस्वामी
डीटीसी की बसों में मुफ्त यात्रा करने वाला कोई भी हो अब बेटिकट यात्रा नहीं कर पाएगा। चाले वह दिल्ली पुलिस का जवान ही क्यों न हो। इस बावत परिवहन मंत्रालय बहुत जल्द उपराज्यपाल तेजेन्द्र खन्ना से मिलेगा। उनके बात करेगा कि या तो पुलिस के जवान टिकट खरीदें या फिर उनके लिए रियायती पास जारी कर दिए जाएं। अगर यहां से भी बात नहीं बनेगी तो गृह मंत्री से मुलाकात की जाएगी। दिल्ली सरकार के परिवहन मंत्री रमाकांत गोस्वामी के मुताबिक बहुत जल्द मुफ्त की यात्रा को रोकी जाएगी। सोमवार 10 सितम्बर से विश्ष अभियान छेड़ा जाएगा, जिसकी मानीटरिंग खुद वह करेंगे। बकौल गोस्वामी कोई भी हो, बगैर टिकट यात्रा नहीं करने दी जाएगी। इस तरह अगर वो करते रहेंगे तो डीटीसी को नुकसान होगा ही, साथ ही देखी देखा दूसरे भी करने लगेंगे।

दिल्ली सरकार ने न्यूनतम मजदूरी बढ़ाई

नई दिल्ली, 15 अप्रैल: दिल्ली सरकार के श्रम मंत्री डा. अशोक कुमार वालिया ने आज कहा कि सरकार ने सभी अनुसूचित रोजगार में अकुशल, अर्धकुशल और कुशल श्रेणियों के लिए न्यूनतम मजदूरी की बढ़ी हुई दरें 1 अप्रैल, 2013 से लागू कर दी हैं। मंहगाई भत्ते के समायोजन के बाद नई दरें तय की गयी हैं। नई दरें सभी अनुसूचित रोजगार में क्लर्क और गैर-तकनीकी निरीक्षण कर्मचारियों पर भी लागू होंगी। डा0 वालिया ने कहा कि दिल्ली सरकार समय-समय पर मंहगाई भत्ते के समायोजन के बाद न्यूनतम मजदूरी में वृद्वि करती है ताकि मंहगाई की दर के अनुरूप न्यूनतम मजदूरी मिल सके। उन्होंने कहा कि दिल्ली सरकार देश के सभी राज्यों में सबसे अधिक न्यूनतम मजदूरी बनाये रखती है।

डा0 वालिया ने बताया कि नई दरों के अनुसार अकुशल कामगार की मासिक न्यूनतम मजदूरी 7254 से बढ़कर 7722 रू0 हो गयी है। इस प्रकार दैनिक मजदूरी 279 रू0 से बढ़कर 297 रू0 हो गई है। अर्धकुशल कामगारों की नयी मासिक न्यूनतम मजदूरी 8528 रू0 तय की गयी है जबकि पहले ये 8008 रू0 थी। प्रतिदिन मजदूरी 308 रू0 से बढ़कर 328 रू0 हो गयी है। कुशल कामगार की बढ़ी हुई मासिक न्यूनतम मजदूरी 9386 रू0 निर्धारित की गयी है जबकि पहले ये 8814 रू0 होती थी। प्रतिदिन न्यूनतम मजदूरी 339 रू0 से बढ़कर 361 रू0 हो गयी है।

क्लर्क और गैर-तकनीकी निरीक्षण कर्मचारियों में मैट्रिक से कम योग्यता पर न्यूनतम मजदूरी 8528 रू0 तय की गयी है जबकि पहले यह 8008 रू0 थी। प्रतिदिन मजदूरी 308 रू0 से बढ़कर 328 रू0 हो गयी है। मैट्रिक और स्नातक के बीच योग्यता होने पर न्यूनतम मजदूरी 8814 रू0 से बढ़ाकर 9386 रू0 की गयी है। प्रतिदिन मजदूरी 339 रू0 से बढ़कर 361 रू0 हुई है। स्नातक और उससे अधिक योग्यता पर न्यूनतम मजदूरी 10218 रू0 तय की गयी है जबकि पहले यह 9594 रू0 थी। प्रतिदिन मजदूरी 369 रू0 से बढ़कर 393 रू0 की गयी है।

दिल्ली सरकार ने नियोक्ताओं से आग्रह किया है कि वे पहली अक्तूबर 2013 से बढ़े हुए न्यूनतम वेतन का भुगतान करें। श्रम मंत्री ने सभी को निर्देश दिये कि वे कर्मचारियों को भुगतान केवल इल्ैकट्रोनिक क्लीयरैन्स सिस्टम ;ईसीएसद्ध अथवा चैक से करें। इसी तरह मजदूरों से कहा गया है कि अगर नई दर पर न्यूनतम वेतन नहीं मिलता तो श्रम विभाग से सम्पर्क करें अथवा टोल फ्री नं. 12789 पर शिकायत करें।

 

नाबालिग से दुष्कर्म का प्रयास और छेड़छाड़


नई दिल्ली : यमुनापार में अलग-अलग मामलों में एक किशोरी के साथ दुष्कर्म की कोशिश और दूसरे में छेड़छाड़ का मामला सामने आया है। दोनों ही मामलों में विरोध करने पर आरोपियों ने पीड़ितों के साथ मारपीट की। इतना ही नहीं कल्याणपुरी इलाके में तो आरोपी व उसके पिता ने पीड़ित की बहन व मां पर भी हमला कर दिया। पुलिस मामला दर्ज कर आरोपियों की तलाश कर रही है।

पहला मामला नंदनगरी की है। जहां 15 वर्षीय किशोरी को घर में अकेली पाकर दुष्कर्म का प्रयास किया गया। मिली जानकारी के अनुसार शाम पांच बजे पड़ोसी विनोद (25) किशोरी के घर में घुस दुष्कर्म की कोशिश करने लगा। जब किशोरी ने विरोध किया और शोर मचाने लगी तब उसने किशोरी की जमकर पिटाई कर दी। शोर सुनकर आसपास के लोग इक्ट्ठा हुए तो आरोपी मौका देखकर फरार हो गया। पीड़िता की शिकायत पर नंदनगरी पुलिस मामला दर्ज कर आरोपी की तलाश कर रही है।
दूसरा मामला कल्याणपुरी इलाके का है। यहां 15 व 17 साल की दो बहनें अपने परिवार के साथ रहती हैं। दोनों बहनें किसी काम से शनिवार रात को घर से निकलीं। घर से थोड़ा आगे जाने पर पड़ोस में रहने वाले युवक हातिम ने उनके साथ छेड़छाड़ करनी शुरू कर दी। विरोध करने पर हातिम ने बड़ी बहन की पिटाई कर दी। दोनों बहने भागकर घर पहुंची और मां को आपबीती बताई। मां दोनों को लेकर हातिम के घर पहुंची और उसके पिता से शिकायत करने लगी, लेकिन हातिम के पिता ने उनसे बदसलूकी शुरू कर दी। इसके बाद हातिम व उसके परिवार के लोगों ने उनपर हमला कर दिया। शोर होने से आसपास के लोग इकट्ठा हो गए और पुलिस को सूचना दी। हातिम व उसके परिवार के लोग मौके से फरार हो गए। पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ, छेड़छाड़ व मारपीट के साथ ही पॉक्सो अधिनियम के तहत भी मामला दर्ज किया है।

स्वीडिश कंपनी के दलाल थे राजीव गांधी!

नई दिल्ली।। विकीलिक्स वेबसाइट ने भारत के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के बारे में एक अहम खुलासा किया है जिससे भारतीय राजनीति में भूचाल आ गया है।

विकीलिक्स वेबसाइट ने दावा किया है कि राजीव गांधी भारत के प्रधानमंत्री बनने से पहले जब पायलट के रूप में काम रहे थे तब वे एक स्वीडिश कंपनी साब स्कॉनिया के लिए दलाली का काम भी कर रहे थे।

इतना ही नहीं बल्कि वेबसाइट ने पूर्व रक्षा मंत्री जार्ज फर्नांडिस के बारे में भी सनसनीखेज खुलासे किए हैं।

विकिलीक्स के ये खुलासे एक अंग्रेजी समाचार पत्र में प्रकाशित होने के बाद से सुर्खियों में हैं। हालांकि अभी कांग्रेस ने इस बारे में कोई टिप्पणी नहीं की है।

लेकिन भाजपा के नेता प्रकाश जावडेकर ने सवाल उठाया है कि हर रक्षा सौदे में गांधी परिवार का नाम ही सामने क्यों आता है।

उन्होंने कहा कि इस मामले में गांधी परिवार को जवाब देना चाहिए और तब के दस्तावेज सार्वजनिक होने चाहिए।

खुलासे के अनुसार राजीव गांधी पीएम बनने से पहले इंडियन एयरलाइंस में पायलट की नौकरी के दौरान एक स्वीडिश कंपनी के लिए संभवत: दलाली करते थे।

यही कंपनी साब स्कॉनिया 70 के दशक में भारत को फाइटर प्लेन विजेन बेचने की कोशिश कर रही थी। विकीलिक्स ने इस खुलासे में अमरेरिकी सुरक्षा सलाहाकर रह चुके हेनरी किसिंजर का हवाला देते हुए कहा है कि स्वीडिश कंपनी के साथ सौदा नहीं हो पाया था और ब्रिटिश जगुआर ने बाजी मार ली थी।

इसी तरह फर्नांडिश के बारे में लिखा है कि इमरजेंसी के दौरान उन्होंने भूमिगत रहने के दौरान अमरीकी खुफिया एजेंसी सीआईए से आर्थिक मदद भी मांगी थी।

गौरतलब है कि राजीव गांधी 1980 तक भारतीय राजनीति से दूर रहे। संजय गांधी के आकस्मिक निधन के बाद ही इंदिरा गांधी उन्हें राजनीति में लाई।

अपने पीएम बनने के पहले कार्यकाल में ही वे एक दूसरी स्वीडिश कंपनी से बोफोर्स तोपों की खरीद के लिए हुए सौदे में दलाली के आरोपों से घिर गए। आखिरकार 1989 के चुनावों में कांग्रेस पार्टी को करारी हार मिली।

विकीलिक्स ने 1974 से 1976 के दौरान के जारी 41 केबल्स का हवाला देते हुए लिखा है कि स्वीडिश कंपनी को इस बात का अंदाजा था कि फाइटर एयरक्राफ्ट्स की खरीद के बारे में अंतिम फैसला लेने में गांधी परिवार की भूमिका होगी। फ्रांसीसी एयरक्राफ्ट कंपनी दसो को भी इसका अनुमान था।

उसकी ओर से मिराज फाइटर एयरक्राफ्ट के लिए तत्कालीन वायुसेना अध्यक्ष ओपी मेहरा के दामाद दलाली करने की कोशिश कर रहे थे। हालांकि मेहरा के दलाल के नाम का खुलासा नहीं किया गया।

1975 में दिल्ली स्थित स्वीडिश दूतावास के एक राजनयिक की ओर से भेजे गए केबल संदेश से पता चलता है कि इंदिरा गांधी ने ब्रिटेन के खिलाफ अपने पूर्वाग्रहों की वजह से जगुआर न खरीदने का फैसला किया था। संदेश में कहा गया है कि अब मिराज और विजेन के बीच फैसला होना है।

श्रीमती गांधी के बड़े बेटे बतौर पायलट एविएशन इंडस्ट्री से जुड़े हैं और पहली बार उनका नाम बतौर उद्यमी सुना जा रहा है। फाइनल फैसले को परिवार प्रभावित करेगा।

दूसरे केबल में कहा गया कि इस डील में इंदिरा गांधी की अति सक्रियता से स्वीडन चिढ़ा हुआ था। इस केबल के अनुसार उन्होंने फाइटर प्लेन की खरीद की प्रक्रिया से एयरफोर्स को दूर रखा था।

राजनायिक के मुताबिक 40 से 50 लाख डॉलर प्रति प्लेन के हिसाब से 50 विजेन के लिए बातचीत चल रही थी। स्वीडन को भरोसा था कि भारत सोवियत संघ से और युद्धक विमान न खरीदने का फैसला कर चुका था।


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