Friday, 16 November 2018
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अमेरिका में हर सप्ताह 1700 लड़कियां बनती हैं मां


वाशिंगटन : अमेरिका में हर सप्ताह 15 से 17 साल की करीब 1,700 किशोरियां मां बनती हैं। यूएस सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रीवेंशन (सीडीसी) की रिपोर्ट में यह खुलासा हुआ है।

समाचार एजेंसी सिन्हुआ ने सीडीसी की पत्रिका मोरबिडिटी एंड मोरैलिटी वीकली रिपोर्ट में मंगलवार को जारी रिपोर्ट के हवाले से बताया कि किशोरियों का मां बनना चिंता का विषय है, क्योंकि कानूनी रूप से वे वयस्क नहीं हैं।

अमेरिका में किशोरियों का मां बनना नैतिकता का मामला नहीं है, बल्कि उनके लिए चिंता की बात यह है कि कम उम्र में मां बनना न सिर्फ स्वास्थ्य की दृष्टि से खतरनाक है, बल्कि सामाजिक, आर्थिक और चिकित्सकीय स्तर पर भी यह खतरनाक है।

सीडीसी के निदेशक टॉम फ्रीडेन ने एक बयान में कहा कि हालांकि हमने किशोरियों के मां बनने के आंकड़ों में कमी लाने के प्रयास में महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है, लेकिन अब भी कई सारी लड़कियां किशोरावस्था में ही मां बन रही हैं। यह रिपोर्ट 1991 से 2012 नेशनल वाइटल स्टैटिस्टिक्स सिस्टम और नेशनल सर्वे ऑफ फैमिली ग्रॉथ के सर्वे से प्राप्त किशोरों के स्वास्थ व्यवहार के आंकड़ों पर आधारित है। सीडीसी की रिपोर्ट के मुताबिक, किशोरों के व्यवहार में अभिभावकों और पारिवारिक माहौल का खासा प्रभाव पड़ता है।

सीडीसी ने कहा कि किशोरावस्था में मां बनने का दुष्प्रभाव सभी क्षेत्रों में पड़ता है। स्कूली शिक्षा पूरी करना हो, कॉलेज में नामांकन कराना हो या रोजगार तलाशना। इसलिए किशोरियों में कम उम्र में मां बनने के आंकड़े को घटाने के लिए ठोस कदम उठाए जाने की जरूरत है।
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भारतीय महिलाएं धूम्रपान में विश्व में दूसरे स्थान पर

न्यूयार्क : कौन नहीं चाहेगा कि महिलाएं हर क्षेत्र में विकास करें, लेकिन हाल ही में आए एक अध्ययन में भारत की महिलाओं ने जिस क्षेत्र में विकास किया है उसे शायद ही कोई सराहे, और वह है धूम्रपान। एक शोध पत्रिका में प्रकाशित एक अध्ययन के मुताबिक भारतीय महिलाएं धूम्रपान करने में अमेरिका के बाद विश्व में दूसरे स्थान पर हैं। 

अध्ययन के अनुसार, वैश्विक स्तर पर जहां धूम्रपान करने वाली महिलाओं की संख्या में पिछले तीन दशकों में सात फीसदी का इजाफा हुआ, वहीं भारत में धूम्रपान करने वाली महिलाओं की संख्या में 200 फीसदी से भी अधिक का इजाफा हुआ है। 1980 में भारत में जहां 53 लाख महिलाएं धूम्रपान करती थीं, वहीं 2012 में यह संख्या बढ़कर 1.21 करोड़ हो चुकी है। 

भारत में हालांकि पुरुषों में भी धूम्रपान करने की लत में पिछले तीन दशकों में काफी तेजी से इजाफा हुआ है। भारत में तीन दशक पहले जहां धूम्रपान करने वाले व्यक्तियों की संख्या 7.45 करोड़ थी, वहीं आज लगभग 11 करोड़ व्यक्ति धूम्रपान की लत के शिकार हैं, जिसमें महिलाएं भी शामिल हैं। अमेरिका हालांकि इस बीच तंबाकू सेवन से छुटकारा पाने वालों में सबसे आगे रहा, बावजूद इसके अमेरिकी महिलाएं धूम्रपान में विश्व में पहले स्थान पर हैं। अध्ययन में कहा गया कि भारत, बांग्लादेश, चीन और इंडोनेशिया सहित कई एशियाई देशों में 2006 के बाद से धूम्रपान करने वाले व्यक्तियों की संख्या में तेजी से इजाफा हुआ है।

उन्होंने आगे कहा कि कई देशों में नियंत्रणकारी नीतियां पहले ही लागू कर दी गई हैं, इसके बावजूद जिन देशों में धूम्रपान करने वालों की संख्या में तेजी से बढ़ोतरी हुई है वहां तंबाकू सेवन पर नियंत्रण लगाने के लिए सघन प्रयास किए जाने की जरूरत है। वैश्विक स्तर पर धूम्रपान की लत में 41 फीसदी का इजाफा हुआ है। अध्ययन में कहा गया है कि एशियाई देशों में 15 वर्ष की आयु से अधिक की आबादी में तेजी से वृद्धि होने के कारण धूम्रपान करने वालों की संख्या में तेज इजाफा देखने को मिला है। 

लिव-इन रिलेशंस के संबंध में दिशा-निर्देश तय

नई दिल्ली: उच्चतम न्यायालय ने महिलाओं को सुरक्षा देने के लिए सहजीवन (लिव-इन) संबंध को शादी की तरह के रिश्ते के दायरे में लाने और इस तरह उसे घरेलू हिंसा विरोधी कानून के तहत लाने को लेकर कुछ दिशा-निर्देश तय किए हैं। इनमें संबंध की अवधि, एक ही घर में रहना और वित्तीय संसाधनों में सहभागिता समेत कई अन्य मुद्दे शामिल हैं।

न्यायमूर्ति केएस राधाकृष्णन और न्यायमूर्ति पिनाकी चंद्र घोष की पीठ ने कहा कि हालांकि इस मामले में सिर्फ यह आठ दिशा-निर्देश ही पर्याप्त नहीं हैं, लेकिन इनसे ऐसे रिश्तों को तय करने के मामले में कुछ हद तक मदद जरूर मिल सकेगी।

सहजीवन संबंध को मान्यता देने के लिए दिशा-निर्देश तय करते हुए पीठ ने कहा कि वित्तीय और घरेलू इंतजाम, परस्पर जिम्मेदारी का निर्वाह, यौन संबंध, बच्चे को जन्म देना और उनकी परवरिश करना, लोगों से घुलना-मिलना तथा संबंधित लोगों की नीयत और व्यवहार कुछ ऐसे मापदंड हैं, जिनके आधार पर संबंधों के स्वरूप के बारे में जानने के लिए विचार किया जा सकता है।

पीठ ने कहा कि संबंध की अवधि के दौरान घरेलू हिंसा विरोधी कानून की धारा 2 (एफ) के तहत स्थिति पर विचार हो सकता है और हर मामले तथा स्थिति के हिसाब से संबंध का स्वरूप तक तय किया जा सकता है।

उच्चतम न्यायालय की पीठ ने कहा कि घरेलू इंतजाम, कई घरेलू जिम्मेदारियों को निभाना मसलन सफाई, खाना बनाना, घर की देखरेख करना संबंध के विवाह के स्वरूप में होने के संकेत देते हैं।

न्यायालय ने सहजीवन में रहने वाले एक दंपती के बीच के विवाद का निपटारा करते हुए यह आदेश पारित किया। इस मामले में महिला ने रिश्ता खत्म होने के बाद पुरुष से गुजारा भत्ते की मांग की थी।

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