Thursday, 24 May 2018
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संस्थाओं को उठाना होगा नारी सुरक्षा का बीड़ा


-निर्भया के जन्मदिन 10 मई को घोषित हो Óमहिला सुरक्षा दिवसÓ
-संपूर्णा ने भारत सरकार के समक्ष रखी डिमांड

नई दिल्ली, 4 मई (ब्यूरो): पूरे देश और दुनिया के सामने महिला उत्पीडऩ और शोषण का पर्याय बनी निर्भया के जन्मदिन (10 मई) के दिन को महिला सुरक्षा दिवस के रूप में घोषित किया जाना चाहिए। इसको लेकर महिला एवं सामाजिक संगठनों ने केंद्र सरकार से गुहार लगाई है। पहल सम्पूर्णा ने की है। उसने संगठन की ओर से 10 मई को महिला सुरक्षा दिवस मनाने का ऐलान किया है। संपूर्णा की अध्यक्ष तरूणा कटारिया एवं पूर्व भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष विजेंद्र गुप्ता ने कहा कि निर्भया आज पूरे देश और विश्व के सामने महिला उत्पीडऩ और शोषण का पर्याय बन गयी है। निर्भया के साथ 16 दिसम्बर को जो घटित हुआ वह पूरे समाज के सामने एक प्रश्नचिन्ह है कि आज भी इस देश में महिलाएं कितनी असुरक्षित व भय के साये में जीने के लिए मजबूर हैं।  गुप्ता ने कहा कि 10 मई (निर्भया का जन्मदिन) महिला सुरक्षा दिवस के रूप में घोषित कर देश के महिलाओं की सुरक्षा के प्रति हर वर्ष अपनी प्रतिबद्धता का संकल्प ले, जिससे इस समस्या के समाधान की ओर हम सतत प्रयासरत रहें। उनके मुताबिक दिल्ली महिलाओं को लेकर अपराधों की राजधानी बन गया है।

दिल्ली में लिंग अनुपात को देखें तो यह बहुत ही निराशाजनक विषय है। यह अनुपात 1000 लड़कों पर 866 लड़कियां हैं। मतदाता सूची लिंग अनुपात 1000 लड़कों पर 788 लड़कियां बता रही है। महिलाएं न तो घर में सुरक्षित हैं और न ही घर से बाहर। बच्चे, शारीरिक और मानसिक रूप से अपरिपक्व और वृद्ध महिलाएं लगातार प्रताडि़त और बलात्कार का शिकार हो रहीे हैं।
 गुप्ता ने कहा कि गैंगरेप की शिकार लड़की के परिजनों के साथ उस समय दुख की घड़ी में लगाातार सम्पर्क में रहे और उन्होंने देखा कि किस प्रकार से निर्भया में जीने की जीजिविशा थी। उसने अपनी मां से कहा था कि मां मै जीना चाहती हूँ। किन्तु जिस प्रकार से निर्भया कोश में 100 करोड़ रूपया दिया जाने के बाद भी एक भी मद में एक भी पैसा खर्च नहीं किया गया है।  उससे ऐसा लगता है कि समाजिक संस्थाओं को ही आगे बढ़कर नारी सुरक्षा का बीड़ा उठाना होगा।
सम्पूर्णा की अध्यक्ष तरूणा कटारिया ने कहा कि सम्पूर्णा द्वारा 10 मई को महिला सुरक्षा दिवस मनाया जाएगा। कार्यक्रम का आयोजन कन्वेन्शन हाल एन.डी.एम.सी. विपरीत जन्तर मन्तर पर होगा, जहां विशिष्ट जन अपने मूल्यवान विचारों और अनुभवों से महिलाओं को उनकी सुरक्षा के विभिन्न आयामों से शिक्षित करेंगें। महिलाएं किस तरह अपने आप को सुरक्षित महसूस कर सकती हैं, इसपर भी चर्चा की जाएगी।
सम्पूर्णा कार्यकर्ता मधु दास ने कहा कि बच्चों और महिलाओं पर बढ़ते हुए अपराधों को देखते हुए देश की सरकार को महिला सुरक्षा को एक महत्वपूर्ण बिन्दु बनाना होगा। उन्होंने कहा कि सम्पूर्णा महिला की सुरक्षा को लेकर बहुत गम्भीर है। लगातार 9 मार्च से दिल्ली के कोने-कोने में प्रशिक्षण के कार्यक्रम कर रही है, और अब 50000 लड़कियों के माध्यम से महिला सुरक्षा के संदेश को घर-घर पहुंचा रहे हैं।  

 

विवाह कानून पर भिडे पुरूष व महिला मंत्री

-कैबिनेट में मतभेद, मंत्री समूह के पास विवाह कानून
-तलाक के बाद महिलाओं को मिले हिस्सा: कानून मंत्री
नई दिल्ली: प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने विवादास्पद विवाह कानून ‘संशोधन’ विधेयक को मंत्रियों के समूह को सौंप दिया है। इसमें तलाक की स्थिति में वैवाहिक संपत्ति में महिला के अधिकार से संबंधित प्रावधानों को लेकर मंत्रियों के बीच मतभेद हो गया था। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अध्यक्षता में हुई केन्द्रीय मंत्रिमंडल की बैठक में इस विधेयक के मसौदे पर लंबी चर्चा हुई लेकिन किसी सहमति पर नहीं पहुंचा जा सका और मामले को मंत्रियों के समूह को विचार के लिए सौंप दिया गया। दो घंटे चली बैठक में कानून मंत्रालय और महिला बाल कल्याण मंत्रालय में सीधे टकराव दिखा। कानून मंत्रालय ने सुझाव दिया था कि महिला को तलाक की स्थिति में उसके पति की आवासीय संपत्ति में हिस्सा मिलना चाहिए और इसमें उसकी विरासत वाली तथा विरासत योग्य आवासीय संपत्ति शामिल है। जबकि, महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने सुझाव दिया है कि विरासत वाली संपत्ति और विवाह से पूर्व पति द्वारा अर्जित संपत्ति से महिलाओं के अधिकार को इस कानून में शामिल नहीं किया जाना चाहिए।
मंत्रियों ने कैबिनेट की बैठक में कानून में इस प्रस्तावित संशोधनों पर दो से अधिक घंटे चर्चा की। बावजूद इसके फैसला नहीं निकला। बाद में संवाददाताओं के सवालों के जवाब में वित्तमंत्री पी चिदंबरम ने कहा, ‘जब विद्वान पुरूष और महिलाएं अलग-अलग विचार रखें,तो अलग विचार रखने का अर्थ मतभेद नहीं होता है.। उन्होंने कहा, ‘कैबिनेट की बैठक में विचार रखे गए और उन विचारों को देखते हुए प्रधानमंत्री ही अंतिम निर्णय करते हैं। इस मामले में विधेयक के एक या दो प्रावधानों पर गौर करने के लिए उन्होंने इसे मंत्रियों के समूह को सौंप दिया है। वित्तमंत्री ने कहा मंत्री समूह अगले कुछ दिनों में इन प्रावधानों पर विचार करेगा और उसके बाद विधेयक फिर कैबिनेट में आएगा।
देश में बन रहा कानून अगर लागू हो गया, तो कई सारी पेचिदगियां बढ़ जाएगीं। शादी की शर्तों से लेकर तलाक तक तमाम पहलू पेचीदा हो जाएंगे। हिंदू मैरिज एक्ट में संशोधन को लेकर कैबिनेट भी कोई फैसला नहीं हो सका।
इस बहस की शुरुआत तो देश के कानून मंत्रालय ने किया था, मगर इस पर आम सहमति सरकार के बीच ही नहीं बन रही। मसला है शादी टूटने के बाद महिलाओं के हक की, देश के कानून मंत्री चाहते हैं तलाक के बाद महिलाओं को पति के साथ उसकी पुश्तैनी जायदाद में भी हिस्सा मिले, लेकिन इस सिफारिश पर अंतर्विरोध अंदर और बाहर जारी है।

तलाक के बाद पत्नियों को पति के पुश्तैनी हक दिलाने के सवाल पर कैबिनेट की बैठक बुलाई गई थी. बैठक में कानून मंत्री ने अपना पक्ष रखा। चर्चा शुरू हुई तो गुलाम नबी आजाद, कपिल सिब्बल, कमलनाथ यहां तक कि कृष्णा तीरथ जैसे कई मंत्रियो ने इसका विरोध किया.
कैबिनेट के अंतर्विरोध को चिंदबरम ने भले ही सधे हुए लहजे में बयां कर दिया, लेकिन बात इतनी सहज है नहीं। हिंदू मैरिज ऐक्ट में संशोधन के बहाने कानून मंत्री भले ही महिलाओं को ज्यादा हक दिलाने की वकालत करते हों, लेकिन कैबिनेट के कई सदस्यों को डर है कि कही इस प्रावधान से परिवार का वजूद ही खतरे में नहीं पड़ जाए। कैबिनेट के मंत्रियो की तरह कई तरह की आशंकाए प्रदर्शन कर रहे लोगों की तख्तियों से भी जाहिर है। संशोधन का विरोध कर रहे सेव द फेमिली फाउंडेशन की नजर में नया कानून पत्नी-पत्नी और परिवार नुकसान पहुंचाने वाला है।

हिन्दू मैरिज एक्ट है क्या?
शादियों को कानूनी शर्त में बांधन के लिए हिंदू मैरेज एक्ट बना था. ये बात आजादी के 8 साल बाद 1955 की है. तब से लेकर इस एक्ट में कई तमाम संशोधन हुए- लेकिन इसे लेकर सरकार का ऐसा अंतर्विरोध शायद ही सामने आया. इस बार तो सरकार की कोशिश की आलोचना हर तरफ हो रही है।. विपक्ष तो विपक्ष सामाजिक संगठन भी सरकार की मंशा का विरोध कर रहे हैं।
हमारी परंपरा में कहावत तो ये है कि शादियां स्वर्ग में तय होती हैं, इसे निबाहने के लिए 7 फेरों के 7 वचन ही काफी हैं। लेकिन बदलते जमाने की ये सहजता कई पेचिदगियों से भर चुकी है। इन्हीं पेचिदगियों से बचने के लिए लिए संविधान में हिंदू मैरिज एक्ट का प्रवाधान किया गया था। शादियों को टूटने से बचाने और इसे कानूनी शर्तों में बांधने के लिए 1955 में हिंदु मैरिज एक्ट बनाया गया, मगर टूटते बिखरते रिश्तों का आलम आज ये है, कि कोर्ट को भी एक्ट को लचीला बनाना पड़ा।

पुरूषों के मुकाबले महिला नेता कम भ्रष्ट?

नई दिल्ली, क्या महिला नेता अपने पुरुष सहयोगियों के मुकाबले कम भ्रष्ट होती हैं। इस सवाल का जबाव तलाशते हुए विश्व बैंक की एक रिपोर्ट में भारत के उल्लेख का जिक्र पहले कर लेते हैं।रिपोर्ट के अनुसार भारत की ग्राम पंचायतों में महिला आरक्षण कानून लागू होने के बाद से जिन गांवों में महिला सरपंच हैं, वहां पुरूष सरपंचों वाले गांवों की तुलना में रिश्वत के मामले 2.7 प्रतिशत से 3.2 प्रतिशत कम रहे। बैंक की वार्षिक विश्व विकास रिपोर्ट के अनुसार भारत में पंचायतों में महिलाओं की भागीदारी 30 प्रतिशत होने के बाद से गांवों में बदलाव दिखने लगा हैं, गांवों में भ्रष्टाचार अपेक्षाकृत कम हुआ, स्वच्छ पेयजल, स्कूल, स्वच्छता आदि विषयों पर ज्यादा ध्यान दिया जाने लगा, यानि प्राथमिकतायें बदली। अक्सर कहा जाता है कि अगर सता में महिलायें ज्यादा आयें तो भ्रष्टाचार से ज्यादा अच्छी तरह से निबटा जा सकेगा, तर्क है कि महिलायें कम रिश्वत लेती है और उन्हें निजी कायदे से ज्यादा दुनिया की भलाई की फिक्र रहती है, लेकिन क्या यह सही है? अक्सर कहा जाता है कि यह सवाल खुद में एक गुत्थी है, भ्रष्टाचार को की पुरूष से जोडना एक पहेली है, लेकिन कुछ सर्वेक्षणों से यह भी जरूर पता चला है कि भ्रष्टाचार पर कुछ चोट तो निश्चय ही उनके आने से हो जाती है, ऐसा लगता है कि महिलायें जहां शीर्ष पदों पर पहुंचती है अधिकतर ऐसे समाज ज्यादा लोकतांत्रिक व पारदर्शी होते हैं और इस तरह के समाज में सामान्यत: भ्रष्टाचार को लेकर ज्यादा रोष होता है और वे समाज उसे बर्दाश्त नहीं करते हैं। महिलाओं के सत्तारढ होने से शासन बेहतर तरीके से चलता है और इससे निश्चय ही भ्रष्टाचार कम होता है। पेरू में सुश्री रूबरीना करीम द्वारा किये गये एक सर्वेक्षण के अनुसार जब यातायात पुलिस में 2500 महिला कर्मियों को एक साथ शहर की सडकों पर गश्ती ड्यूटी पर लगाया गया तो पिछले 14 वर्षों के भ्रष्टाचार के आंकडों में कमी आई। मैक्सिको ने भी इसी उदाहरण को अपनाते हुए सडकों पर भ्रष्टाचार कम करने के लिए महिला पुलिसकर्मियों को सडकों पर गश्ती ड्यूटी पर तैनात कर दिया। वर्ष 1975 से 1978 तक ईरान में महिलाओं के मामले की मंत्री रही तथा फिलहाल एक महिला संस्था की प्रमुख एक महनाज अरवामी का कहना है कि अगर महिलाओं की आवाज ताकतवर होती है तो सरकार की क्वालिटी पर गहरा सकारात्मक असर पडता है। इंडोनेशिया की पहली महिला वित्त मंत्री मुलयानी इंद्रावती जिसे कडक तथा तेज तर्रार सुधारवादी कहा जाता है, उनका भी कहना है कि अगर बुनियादी स्तर पर ज्यादा से ज्यादा महिलायें सत्ता में आती है तो संसाधनों के आवंटन की प्राथमिकतायें निश्चय ही बदलती है, महिलायें पहले बच्चों के बारे में सोचती हैं, बच्चों का तथा परिवार को पेट कैसे भरे जायें, जबकि अधिकतर पुरूष ज्यादातर अपने हितों के बारे में सोचते हैं।


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