Sunday, 23 September 2018
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विवाह कानून पर भिडे पुरूष व महिला मंत्री

-कैबिनेट में मतभेद, मंत्री समूह के पास विवाह कानून
-तलाक के बाद महिलाओं को मिले हिस्सा: कानून मंत्री
नई दिल्ली: प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने विवादास्पद विवाह कानून ‘संशोधन’ विधेयक को मंत्रियों के समूह को सौंप दिया है। इसमें तलाक की स्थिति में वैवाहिक संपत्ति में महिला के अधिकार से संबंधित प्रावधानों को लेकर मंत्रियों के बीच मतभेद हो गया था। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अध्यक्षता में हुई केन्द्रीय मंत्रिमंडल की बैठक में इस विधेयक के मसौदे पर लंबी चर्चा हुई लेकिन किसी सहमति पर नहीं पहुंचा जा सका और मामले को मंत्रियों के समूह को विचार के लिए सौंप दिया गया। दो घंटे चली बैठक में कानून मंत्रालय और महिला बाल कल्याण मंत्रालय में सीधे टकराव दिखा। कानून मंत्रालय ने सुझाव दिया था कि महिला को तलाक की स्थिति में उसके पति की आवासीय संपत्ति में हिस्सा मिलना चाहिए और इसमें उसकी विरासत वाली तथा विरासत योग्य आवासीय संपत्ति शामिल है। जबकि, महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने सुझाव दिया है कि विरासत वाली संपत्ति और विवाह से पूर्व पति द्वारा अर्जित संपत्ति से महिलाओं के अधिकार को इस कानून में शामिल नहीं किया जाना चाहिए।
मंत्रियों ने कैबिनेट की बैठक में कानून में इस प्रस्तावित संशोधनों पर दो से अधिक घंटे चर्चा की। बावजूद इसके फैसला नहीं निकला। बाद में संवाददाताओं के सवालों के जवाब में वित्तमंत्री पी चिदंबरम ने कहा, ‘जब विद्वान पुरूष और महिलाएं अलग-अलग विचार रखें,तो अलग विचार रखने का अर्थ मतभेद नहीं होता है.। उन्होंने कहा, ‘कैबिनेट की बैठक में विचार रखे गए और उन विचारों को देखते हुए प्रधानमंत्री ही अंतिम निर्णय करते हैं। इस मामले में विधेयक के एक या दो प्रावधानों पर गौर करने के लिए उन्होंने इसे मंत्रियों के समूह को सौंप दिया है। वित्तमंत्री ने कहा मंत्री समूह अगले कुछ दिनों में इन प्रावधानों पर विचार करेगा और उसके बाद विधेयक फिर कैबिनेट में आएगा।
देश में बन रहा कानून अगर लागू हो गया, तो कई सारी पेचिदगियां बढ़ जाएगीं। शादी की शर्तों से लेकर तलाक तक तमाम पहलू पेचीदा हो जाएंगे। हिंदू मैरिज एक्ट में संशोधन को लेकर कैबिनेट भी कोई फैसला नहीं हो सका।
इस बहस की शुरुआत तो देश के कानून मंत्रालय ने किया था, मगर इस पर आम सहमति सरकार के बीच ही नहीं बन रही। मसला है शादी टूटने के बाद महिलाओं के हक की, देश के कानून मंत्री चाहते हैं तलाक के बाद महिलाओं को पति के साथ उसकी पुश्तैनी जायदाद में भी हिस्सा मिले, लेकिन इस सिफारिश पर अंतर्विरोध अंदर और बाहर जारी है।

तलाक के बाद पत्नियों को पति के पुश्तैनी हक दिलाने के सवाल पर कैबिनेट की बैठक बुलाई गई थी. बैठक में कानून मंत्री ने अपना पक्ष रखा। चर्चा शुरू हुई तो गुलाम नबी आजाद, कपिल सिब्बल, कमलनाथ यहां तक कि कृष्णा तीरथ जैसे कई मंत्रियो ने इसका विरोध किया.
कैबिनेट के अंतर्विरोध को चिंदबरम ने भले ही सधे हुए लहजे में बयां कर दिया, लेकिन बात इतनी सहज है नहीं। हिंदू मैरिज ऐक्ट में संशोधन के बहाने कानून मंत्री भले ही महिलाओं को ज्यादा हक दिलाने की वकालत करते हों, लेकिन कैबिनेट के कई सदस्यों को डर है कि कही इस प्रावधान से परिवार का वजूद ही खतरे में नहीं पड़ जाए। कैबिनेट के मंत्रियो की तरह कई तरह की आशंकाए प्रदर्शन कर रहे लोगों की तख्तियों से भी जाहिर है। संशोधन का विरोध कर रहे सेव द फेमिली फाउंडेशन की नजर में नया कानून पत्नी-पत्नी और परिवार नुकसान पहुंचाने वाला है।

हिन्दू मैरिज एक्ट है क्या?
शादियों को कानूनी शर्त में बांधन के लिए हिंदू मैरेज एक्ट बना था. ये बात आजादी के 8 साल बाद 1955 की है. तब से लेकर इस एक्ट में कई तमाम संशोधन हुए- लेकिन इसे लेकर सरकार का ऐसा अंतर्विरोध शायद ही सामने आया. इस बार तो सरकार की कोशिश की आलोचना हर तरफ हो रही है।. विपक्ष तो विपक्ष सामाजिक संगठन भी सरकार की मंशा का विरोध कर रहे हैं।
हमारी परंपरा में कहावत तो ये है कि शादियां स्वर्ग में तय होती हैं, इसे निबाहने के लिए 7 फेरों के 7 वचन ही काफी हैं। लेकिन बदलते जमाने की ये सहजता कई पेचिदगियों से भर चुकी है। इन्हीं पेचिदगियों से बचने के लिए लिए संविधान में हिंदू मैरिज एक्ट का प्रवाधान किया गया था। शादियों को टूटने से बचाने और इसे कानूनी शर्तों में बांधने के लिए 1955 में हिंदु मैरिज एक्ट बनाया गया, मगर टूटते बिखरते रिश्तों का आलम आज ये है, कि कोर्ट को भी एक्ट को लचीला बनाना पड़ा।

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