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चीन पर जंग का जुनून, करायेगा ‘वल्र्डवार’

संपादकीय ब्लॉग

चीन पर जंग का जुनून, करायेगा ‘वल्र्डवार’

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बेशक, युद्ध किसी भी समस्या का हल नहीं है, लेकिन सच यह भी है कि सामने वाले दुश्मन पर नरमी भी ठीक नहीं हो, खासतौर से तब जब उस पर युद्ध का जुनून सवार हो। बीते दिनों दोनों देशों के बीच तय हुआ था कि चीन की सेना गलवान घाटी में पेट्रोलिंग प्वाइंट 14, 15 और 17 ए से पीछे हटेगी। चीन सेना ‘योक नदी और गलवान नदी‘ के मुहाने तक आ गई थी। धीरे-धीरे पीछे हट भी रही थी, लेकिन पूरी तरह से पीछे नहीं हटी थी। सोमवार को निर्णय हुआ था कि चीन की सेना पूरी तरह पीछे जाएगी। लेकिन दोनों देशों के आर्मी अफसरों के फैसले के बाद जब चीनी सेना ने पीछे जाने से इनकार किया तो हिंसक झड़प हुई। इस झड़प में हमारे सीनियर अधिकारी और 20 जवान शहीद हुए हैं। जवाबी कार्रवाई में  चीनी जवान मारे गए है। यानी चीन सीमा पर स्थिति तनावपूर्ण बनी हुई है। इस खूनी तनाव को देखते हुए यही कहा जा सकता है कि अभी नरमी का वक्त नहीं है। आपसी बातचीत के बीच हरहाल में अलर्ट मोड में भी जवानों को रहना होगा। क्योंकि विवाद महीने भर से चल रहा है, लेकिन हल नहीं निकल रहा है।

बहरहाल, पूर्वी लद्दाख में गलवान नदी ऐसे सेक्टर्स में से एक है जो हाल में भारत और चीन की सेनाओं के बीच गतिरोध होने की वजह से सुर्खियों में हैं। दोनों सेनाएं हालांकि लाइन-ऑफ-एक्चुअल कंट्रोल (एलएसी) पर अपने-अपने क्षेत्र में हैं लेकिन अभी तक स्थिति सामान्य नहीं हुई है। बता दें, 1962 में भारत और चीन का युद्ध हुआ था। इस युद्ध के बाद 1975 पर एलएसी पर फायरिंग हुई थी, जिसमें चार भारतीय जवान शहीद हुए थे। इसके बाद से एलएसी पर कोई हिंसक झड़प नहीं हुई थी। आज करीब 45 साल बाद एलएसी पर भारत और चीनी सैनिक के बीच हिंसक झड़प हुई, जिसमें भारतीय सेना के अधिकारी और दो जवान शहीद हो गए हैं। विवाद की असल वजह में से एक शिनजियांग और तिब्बत के बीच सड़क का निर्माण है। यह राजमार्ग आज जी219 के रूप में जाना जाता है।

इस सड़क का लगभग 179 किमी हिस्सा अक्साई चिन से होकर गुजरता है, जो एक भारतीय क्षेत्र है। भारतीय सहमति के बिना सड़क का निर्माण करने के बाद, चीनी दावा करने लगे कि ये क्षेत्र उन्हीं का है। 1959 तक जो चीनी दावा था, उसकी तुलना में सितंबर 1962 (युद्ध से एक महीने पहले) में वो पूर्वी लद्दाख में और अधिक क्षेत्र पर दावा दिखाने लगा। नवंबर 1962 में युद्ध समाप्त होने के बाद चीनियों ने अपने सितंबर 1962 के दावे लाइन की तुलना में भी अधिक क्षेत्र पर कब्जा कर लिया। तभी से यह विवाद है।

चीन अपने शिनजियांग-तिब्बत राजमार्ग से भारत को यथासंभव दूर रखना चाहता था। इसी के तहत चीन ने अपनी दावा लाइन को इस तरह तैयार किया कि सभी प्रमुख पहाड़ी दर्रों और क्रेस्टलाइन्स पर उसका कब्जा दिखे। पर्वत श्रृंखलाओं के बीच आने-जाने के लिए पहाड़ी दर्रों की आवश्यकता होती है, उन्हें नियंत्रित करके, चीन चाहता था कि भारतीय सेना पश्चिम से पूर्व की ओर कोई बड़ा मूवमेंट न हो सके। इसी तरह, चीन यह सुनिश्चित करना चाहता था कि एलएसी उच्चतम क्रेस्टलाइन्स से गुजरे जिससे कि भारत प्रभावी ऊंचाइयों को नियंत्रित नहीं कर सके। क्रेस्टलाइन्स को लेकर चीन ने यह सुनिश्चित किया कि एलएसी न केवल उच्चतम क्रेस्टलाइन से गुजरे, बल्कि वह जितनी संभव हो सके पश्चिम की ओर रहे।

इस तरह़ एलएसी और चीनी जी219 राजमार्ग के बीच अधिक दूरी होगी। गलवान नदी के मामले में उच्चतम रिजलाइन अपेक्षाकृत नदी के पास से गुजरती है जो चीन को श्योर रूट के दर्रों पर चीन को हावी होने देती है। इसके अलावा, अगर चीनी गलवान नदी घाटी के पूरे हिस्से को नियंत्रित नहीं करता तो भारत नदी घाटी का इस्तेमाल अक्साई चिन पठार पर पर उभरने के लिए कर सकता था और इससे वहां चीनी पोजीशन्स के लिए खतरा पैदा होता।

1975 में अरुणाचल प्रदेश के तुलुंग ला में असम राइफल्स के जवानों की पेट्रोलिंग टीम पर अटैक किया गया था। इस हमले में चार भारतीय जवान शहीद हो गए। चीन के साथ जब भी भारत के युद्ध की बात की जाती है तो 1962 और 1967 को सबसे ज्यादा याद किया जाता है। 1962 में भारत की शिकस्त और 1967 में चीन को सबक सिखाने की गाथा का हर कोई जिक्र करता है। लेकिन इन दोनों युद्ध के बाद दोनों देशों के बीच सीमा पर एक घटना ऐसी भी हुई थी, जिसके बाद अब लद्दाख की गलवान घाटी में जवानों की शहादत हुई है।
बहरहाल, ये विवाद भी सुलझ गया और तब से लेकर अब तक एलएसी पर भारत और चीन के बॉर्डर पर कोई शहादत नहीं हुई है। दोनों सेनाओं के बीच खूब खींचतान होती है। हाथा-पाई तक हो जाती है, लेकिन कभी गोली नहीं चली है। गोली इस बार गलवान घाटी में भी नहीं चली है, लेकिन हिंसा हुई है, जो क्षम्य नहीं है।

चीनी सैनिकों ने भारतीय सैनिकों पर पत्थरबाजी की है, उन्होंने लोहे की नाल, कीलें और लठ से भारत के सैनिकों पर हमला किया। यह विवाद पिछले एम माह से चल रहा है। कभी एलएसी के पास चीन के हेलिकॉप्टर का देखा जाना तो कभी अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत और चीन का सीमा विवाद सुलझाने के लिए मध्यस्थता की बात कही। लेकिन चीनी फौज लद्दाख से लेकर अरुणाचल प्रदेश तक डटी हुई है, लिहाजा भारत ने भी इसके जवाब में बड़ी संख्या में अपनी सेना तैनात की है। लेकिन पाकिस्तान की तरह चीन व भारत के बीच गोलाबारी नहीं होती। क्योंकि साल 1993 में तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव ने चीन की यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच एलएसी पर शांति बरकरार रखने के लिए एक समझौता किया गया।

समझौते के तहत 9 बिंदुओं पर आम सहमति बनी। इसमें से आठ बहुत महत्वपूर्ण माने गए थे। समझौते को भारत के तत्कालीन विदेश राज्य मंत्री आर एल भाटिया और तत्कालीन चीनी उप विदेश मंत्री तांग जियाशुआन ने साइन किया था। इस समझौते की मुख्य बात यह थी कि भारत-चीन सीमा विवाद को शांतिपूर्ण तरीके से हल करने पर जोर दिया जाएगा। इसमें तय हुआ कि दूसरे पक्ष के खिलाफ बल या सेना प्रयोग की धमकी नहीं दी जाएगी। दोनों देशों की सेनाओं की गतिविधियां वास्तविक नियंत्रण रेखा से आगे नहीं बढ़ेंगी। अगर एक पक्ष के जवान वास्तविक नियंत्रण की रेखा को पार करते हैं, तो उधर से संकेत मिलते ही तत्काल वास्तवित नियंत्रण रेखा में वापस चले जाएंगे। लेकिन अब स्थिति उलट है।

दोनो देशों की सैन्य ताकत

चीन और पाकिस्तान भारत के लिए ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया के लिए खतरा बन गए हैं। चीन दुनिया में लाखों लोगों की जान लेने वाले कोरोना वायरस का केंद्र है तो पाकिस्तान आतंकवाद का केंद्र है। लेकिन ये दोनों देश अब परमाणु हथियारों की दौड़ में भी बहुत आगे निकल गए हैं। परमाणु हथियारों पर नजर रखने वाली अंतरराष्ट्रीय संस्था ‘स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट’ (सिपरी) ने अपनी एक रिपोर्ट में इसका जिक्र किया है। इस रिपोर्ट के मुताबिक इस समय पाकिस्तान के पास 160 और चीन के पास 320 परमाणु हथियार हैं। चीन ने पिछले एक साल में 30 नए परमाणु हथियारों का निर्माण किया है जबकि भारत के पास कुल 150 परमाणु हथियार हैं। भारत के परमाणु हथियार घटे हैं या बढ़े इसका जिक्र इस रिपोर्ट में नहीं है। इस रिपोर्ट में चीन को लेकर ये चिंता भी जताई गई है कि वो अपने परमाणु हथियारों का सार्वजनिक तौर पर ज्यादा प्रदर्शन कर रहा है। चीन ने जमीन और समुद्र से वार करने मे सक्षम नई परमाणु मिसाइलें बनाई हैं और चीन ने परमाणु हथियार ले जाने वाला एयरक्राफ्ट भी बनाया है।

नेपाल व भारत के बीच तनातनी

एक तरफ लद्दाख में भारत और नेपाल के बीच सीमा विवाद अब तक पूरी तरह नहीं सुलझा है। दूसरी तरफ पाकिस्तान, कश्मीर के इलाकों में लगातार गोलीबारी कर रहा है। और अब नेपाल के साथ भी भारत के रिश्तों में दरार बढ़ रही है। लेकिन इस बात में तो कोई शक ही नहीं है कि भारत और नेपाल के बीच नक्शे से जुड़े इस पूरे विवाद के केंद्र में चीन है। जिसने इस विवाद की स्क्रिप्ट भी तैयार की है और नेपाल के प्रधानमंत्री के.पी. ओली के हर एक्शन का निर्देशन भी चीन ही कर रहा है। यही वजह है कि नेपाल की संसद में विवादित नक्शे में संशोधन का प्रस्ताव पास हो गया। नए नक्शे में भारत के तीन हिस्से कालापानी, लिपुलेख और लिम्पिया-धुरा को शामिल किया गया है। बता दें कि भारत और नेपाल के बीच करीब 1800 किलोमीटर की सीमा है। दोनों देशों के लोगों के दिलों की तरह ये सीमा भी, पूरी तरह खुली हुई है। चीन के बहकावे में आकर नेपाल की सरकार ने नक्शे में तो बदलाव कर दिए, लेकिन इससे वो दोनों देशों के लोगों के दिलों में दूरियां पैदा नहीं कर सकती।

                                                                                                                                             साभार : सुरेश गांधी

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